लघुकथा- ले हलुआ पार्ट - 1


जिस दिन ऑफिस जाने की जल्दी नहीं रहती है उस दिन नींद अक्सर जल्दी ही खुल जाती है,आज रविवार होने की वजह से चुन्नीबाबू की नींद जल्दी ही खुल गई,चुन्नी बाबू ने सोचा जब जल्दी उठ ही गए है तो जल्द से जल्द नित्यकर्म करके थोडी गुजरात के चुनावी अखाड़े की जानकारी अखबार से क्यों न समेट लिया जाए।

चुन्नीबाबू पेशे से हिंदी के प्रोफेसर हैं,उनकी दिलचस्पी साहित्य के अलावा समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र पर कुछ ज्यादा ही है,और हो भी क्यों न जब से वर्तमान की सरकार बनी है। तब से चुन्नीबाबू  सरकार की मुरीद बन गए है। वर्तमान सरकार के हर फैसले जैसे नोटबन्दी, जी.एस.टी, वन्देमातरम, गाय, गोबर भारतमाता से इतना प्रेम हो गया है कि गाहे बगाहे इस मुद्दे के विरुध्द में बोलने वाले के शब्दों के वार से मुंह तोड़ देना चाहते हैं।तर्क में इतने माहिर की कोई इसकी सानी नहीं,भले तर्क में दिए गए प्रमाण बेसलेश ही क्यों न हो,जीत हमेशा उनकी ही हुई है।

अब सुबह के नित्यकर्म करने के पश्चात अखबार में मुंह घुसेड़े इतने व्यस्त हो गए की पता ही नहीं चला कि सुबह सात बजे से साढ़े नौ कैसे बज गए। आज सुबह किसी वजह से घर के नौकर रामु काम पर नहीं आया है।जिसके कारण श्रीमती जी को घर के कामों का अधिक चाप हो गया है। छोटे बच्चे की देखभाल ,रसोई, घर की साफ सफाई के अलावा प्रोफेसर साब जी फरमाइस का खाना।

श्रीमती जी सुबह से बेहाल, नाकभौं सिकोड़े चुन्नीबाबू के सामने डटकर कहती हैं,"आज छुट्टी में अखबार ही बाचोगे की घर का कुछ काम भी करना है" ऐसे तीक्ष्ण प्रहार से प्रोफेसर साब की ज्ञान का तंद्रा टूटता है,वह भौचक्क होकर श्रीमती से कहत5 है "क्या हुआ भाग्यवान सुबह-सुबह इतने बरस क्यों रही हो,देखती नहीं, गुजरात के चुनावी अखाड़े में दम साधे खड़ा हूँ,पप्पू की हिमाकत देख रहा हूँ,मोदी जी तीन दिन में बीसों रैलियां और सभाएं कर पप्पू की नींद हराम कर दी है।"श्रीमती जी चिढ़ते हुए कहती है "नींद पप्पू की नहीं, मेरी हराम हो गई है,रामू काम पर नहीं आया है।घर में सब्जी भाजी तक नहीं,आप उठिए और बाजार से सब्जी लेकर आइए,घर पर है तो कुछ काम कीजिए।" चुन्नीबाबू भले ही बाहर तर्कशास्त्र में महारत हाशिल किए हो, पर होम मिनिस्टर के आगे सारे तर्कशास्त्र धता साबित हो जाते हैं। श्रीमती जी से सब्जी की लिस्ट, थैला और पांच सौ रुपए लिए तुरंत बाजार पहुंचते हैं।

सब्जीवाले नंदू देखते ही सलाम ठोकता हुए कहता है "बाबू साब क्या बात है कई महीनों बाद बाजार में दिखाई दिए।" प्रोफेसर साब नाक भौं सिकोड़ते हुए कहा "अरे !आज रमुआ काम पर नहीं आया है,इसलिए आना पड़ा। ये लो लिस्ट और सारे सब्जी दे दो।भाव ठीक से लगाना।" नंदू लिस्ट की सारी सब्जी देते हुए कुल चार सौ साठ रुपये का हिसाब देता है। सब्जी के दाम देखते ही चुन्नीबाबू आग बबूला होते हुए नंदू को फटकारते हुए कहता है " क्या लूट मचा रखे हो नंदू इन थोड़े से सब्जी के चार सौ साठ रुपये,इतने सारे सब्जी तो पहले एक या डेढ़ सौ की ही होगी।" नंदू हंसते हुए चुन्नीबाबू से कहता है "साब आप सपना तो नहीं देख रहे हैं, बरसात से जो सब्जी के दाम चढ़े है आज तक उसी दाम में बेचना पड़ रहा,ऊपर से माल को आड़त से लाने में खर्च बढ़  गया है,जब से ये सरकार जीएसटी लागू की है,सब्जी ऐसे ही दामों में बिक रहा है।" 

क्या बकवास कर रहे हो नंदू,मैं रोज अखबार  पढता हूँ, कभी तो सब्जी पर जीएसटी नहीं लगा,फिर तीन गुना दाम बढाकर क्यों ले रहे हो,तुम सबको पुलिस के हवाले कर दूँगा।

"साब सब्जी लेनी हो तो इसी दाम में लेने होंगे,नहीं तो किसी और दुकान जाइए।"

प्रो.चुन्नीबाबू को ऐसी उत्तर की आशा नहीं थी,सब्जीवाले के मुँह से ऐसी बातें सुन अपमानित महसूस कर रहे थे।आंव देखा न तांव सारे सब्जी उसकी दुकान में उढेल कर आगे बढ़ गए। पर मरता क्या न करता,हार कर किसी दूसरे दुकान से मन ममोस कर सब्जी खरदनी पड़ी। रास्ते भर सब्जीवाले पर बड़बड़ाते हुए घर पहुंचे। घर पहुंचते ही श्रीमती पर अपने गुस्से का ठीकरा फोड़ा " अब मैं कभी सब्जी ख़रीदने नहीं जाऊंगा,रामु न हो तो खुद ही ख़रीद लेना।" "पर हुआ क्या,इतने गुस्से में क्यों हो ? सब्जी लाने कहा इसलिए गुस्से में हो क्या?" "और नहीं तो क्या,सारे सब्जीवाले चोर हो गए,सब्जियों के दाम तीन से चार गुना बढाके रखा है।ऊपर से कहता है जीएसटी के कारण महंगे हो गए, खामखां सरकार को बदनाम करता है,साले टैक्स चोर।लगता है मैं बेवकूफ हूँ, कुछ जानता ही नहीं।" श्रीमती जी चुन्नीबाबू के बात से क्रोधित होकर कहती है "आप अव्वल दर्जे के बेवकूफ हैं।महंगाई कई गुना बढ़ गई है आपको पता ही नहीं चला, घर खर्च के लिए महीने में पंद्रह हजार देकर भूल जाते हैं,मुझे किस तरह घर चलाना पड़ता है मैं ही जानती हूँ।


आप तो दिन भर किताब,मोबाइल,फेसबुक और व्हाट्स एप में ढुके रहते हैं, महीनों बाद एक दिन सब्जी लेकर क्या आए सब चोर हो गए।" "ज्यादा बको मत" "क्यों न ज्यादा बोलूँ जो सच्चाई है उससे मुंह क्यों चुराना,इतने दिनों से कहती आ रही हूं महंगाई बढ़ गई थोड़ा घर खर्च बढ़ा कर दें,आप तो नोटबन्दी और जीएसटी का लाभ बताकर महंगाई कम होनी की बात कहकर उतना ही रुपए मेरे हाथ में रख देते थे, अब समझ में आई न कितनी महंगाई बढ़ी है,अब आप पंद्रह नहीं तीस हजार देंगे घर खर्च के लिए, समझें।" चुन्नीबाबू परेशान होकर कहता हैं "हे भगवान! सरकार का उतना बड़ा झूठ,कथनी और करनी में इतना अंतर।" एक गिलास पानी उसके आगे करती हुई श्रीमती जी कहती है "अब समझ गए न दुनिया किताब और फेसबुक पर ज्ञान देने से नहीं बल्कि धरातल पर उतर कर काम करने से चलती है।"

लेखक- अजय चौधरी



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