26/11 एक ऐसी तारीख़ जो कैलेंडर से निकल कर किताबों तक पहुँच चुकी है।



26/11 ताज हॉटेल में आतंकी हमला।

एक ऐसा ज़ख्म जो दिन पे दिन नासूर बनता जा रहा है। एक ऐसी तारीख़ जो कैलेंडर से निकल कर किताबों तक पहुँच चुकी है। ये केस या तारीख़ कानून की नज़र में भले ही बीती बात हो चुकी हो लेकिन देश के लिए ये कोई बीती बात नहीं है।  जिन्हें जो करना था वो कर के चले गएँ बिना किसी खौफ़ के बिना किसी विरोध के। लेकिन हमें जो करना था क्या वो हम करने ने सफल हुएं शायद नहीं। कुछ लोग किसी और मुल्क से किसी और गुट से आते हैं और हमारे राज्य को , देश को लहूलुहान कर के चले जाते हैं। 

हम लाशों का संस्कार कर फिर नयी आपदा के लिए खड़े हो जाते हैं बजाय इसके की इस समस्या से लड़ा कैसे जाये ? क्यों सरकार के पास हमें देने के लिए मुआवजा तो है लेकिन सुरक्षा नहीं ? हर घटना के बाद मंत्री महोदय का 2 मिनट का मौन और घायलों और मृत परिवारों को मुआवजा।  क्या ये शर्म की बात नहीं है कि हम उस देश में हैं जहाँ लाशों की भी बोली लग रही है ? 4 लाख मरने वाले परिवार को 2 लाख घायल हुए लोगों को। आखिर क्या कारण है कि सरकार हर बार ऐसे मुद्दों से कन्नी काट लेती है। हमनें उसे सत्ता दी है तो उसका इतना दायित्व तो बनता है कि वो हमारी सुरक्षा करे। हमें नहीं चाहिए डिजिटल इंडिया हम ऐसे भी रह लेंगे कम से कम सुरक्षा दे दीजिए हम डिजिटल इंडिया खुद बना लेंगे। 

ऐसी चीज़ें सच में भय का माहौल पैदा कर देती हैं हर इंसान के भीतर। आज सुबह वो निकला है तक शाम तक ज़िंदा घर पहुँचेगा कि नहीं। देश को विकासशील बनाते बनाते कब भुखमरी में बांग्लादेश को पीछाड़ दिया ये भी सोचने वाली बात है। कई मुद्दे हैं लेकिन जो मुख्य मुद्दा है वो है सुरक्षा का कि आखिर कब तक ये लाशों का ढेर लगता रहेगा ? कब तक एक आम आदमी ख़ौफ़ज़दा हो कि घर से बाहर निकेलगा ? 


शायद हमने भी आदत डाल ली है ऐसे जीने की। कोई आ के मार दे या ख़ुद मर जाएँ। सत्ता में बैठे हुक्मरानों से तो हमारी हिफाज़त होने से रही। हाँ ! मरने के बाद परिवार को इस लाश की कीमत मिल जायेगी कुछ वक़्त तो ठीक ठाक कट ही जायेगा उनका। शायद आदत बदलने की ज़रूरत है कि दुबारा 26/11 ना देखने को मिले।

लेखक - - सूरज सरस्वती

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