लघुकथा - ले हलुआ पार्ट - 2



बाजार से आने के बाद चुन्नीबाबू सब्जीवाले के रवैए से काफी खिन्न तो हो ही गया था, ऊपर से पत्नी के व्यंग्य वाण के तीक्ष्ण प्रहारों से दिमागी खलबली मची हुईं थीं। 
सच में वर्तमान सरकार आम लोगों पर नोटबन्दी और जीएसटी से इतना आर्थिक दवाब बना दिया कि टैक्स चोर,कालाबाजारी करनेवालो के साथ आम लोग भी परेशान हैं। चुन्नीबाबू का दिल इस तथ्य को स्वीकार करने सेे मना कर रहा था, वे मन में सोच रहे थे ‘जौं से साथ तो घुन पीस ही जाते हैं’ इसमें कौन सी बड़ी बात।आखिर आम लोगों का भी कर्तव्य बनता है देश के नाम पर थोड़ा कष्ट सहने की। अपने लिए न सही देश के लिए तो थोड़ा कष्ट झेल ही सकता है।

इस बात से चुन्नीबाबू राहत की सांस लेता है। देश के लिए थोड़ा महंगा सब्जी तो खरीद ही सकते हैं। आज कष्ट सहेंगे, तो भविष्य में सुखी रहेंगे। तभी श्रीमती जी आकर पूछती है...

“खाने में क्या बनाऊं?”

 “मटर पनीर और फ़्राईड राइस” 

“होटल समझे हैं क्या”

“जो इच्छा करें बनाओ” पर जाओ यहाँ से अभी मूड ठीक नहीं है। पत्नी के जाने के बाद चुन्नीबाबू फिर राजनीतिक गलियारों में सैर करना शुरू ही करता है कि उसका छोटा बेटा गोलू जो इंटरनेशनल स्कूल के सातवीं का छात्र है।आते ही कहता है “पापा आज संडे है शाम को रेस्टोरेंट में खिलाने का प्रोमिश याद है न।”
“हाँ, बेटा याद है, जरूर चलेगें, मम्मी ,आप और मैं।” 

   शाम को तय समय पर गोलू अपने मम्मी-पापा के साथ शहर के एक आलीशान रेस्तरां में पहुँच जाते हैं। आज गोलू के अनुसार मेनुकार्ड सेलेक्ट होता है,स्टार्टर से लेकर आइसक्रीम तक श्रीमती, चुन्नीबाबू और गोलू मजे से उड़ाते हैं। खाने के बाद चुन्नीबाबू बिल देखकर फिर से चिढ़ जाते हैं। खाने के बिल कुल सताइस सौ पचासी रुपए थे। बैरा को बुलाकर कहता है 

“लगता है आपलोगों ने गलत बिल दिया है।” 

बैरा बड़ी नम्रता से कहता है “नहीं सर बिल का हिसाब बिल्कुल ठीक है,यदि कोई शक हो तो आप खुद चेक कर लें।” चुन्नीबाबू बिल के हर एक हर्फ़ को सावधानी से देखते हुए हिसाब करना शुरू करता है। बिल के सबसे नीचे पांच प्रतिशत जीएसटी देखकर चुन्नीबाबू का मन चिढ़ जाता है। “जितना का खाना नहीं,उससे अधिक तो जीएसटी है।” 

“क्या करें सर,सरकार की नीति है।सबको मानना तो पड़ेगा ही।”

क्या सरकार की नीति,गुजरात चुनाव के दौरान तो इसमें सुधार हुई है,तो क्या इसमें जीएसटी कम नहीं हुआ है।”

“नहीं,सर सिर्फ घोषणा हुई है ,लागू अभी नहीं हुई है।”

रेस्तरां का बिल चुकाते हुए चुन्नीबाबू खिन्न थे,पर कर ही क्या सकता था। सरकार की नीति है आलोचना न करने की मानसिकता विवशता आन्तरिक तूफान मचा रखा था। पर मुख पर दिखावे की हंसी। ताकि श्रीमती जी उससे दुख के भांप कर फिर से मजाक न बनाएं।

रेस्तरां से बाहर निकलकर कुछ दूर चलने के बाद श्रीमती जी पूछ ही बैठती है “क्या बात है, कुछ परेशान लग रहे हैं।क्या रेस्तरां का बिल बहुत अधिक था ?”

“ज्यादा अधिक नहीं था,इतना तो देश के विकास के लिए दे ही सकते हैं।”

जब महंगाई आपको देशसेवा ही लग रहा है परेशान क्यों है ? खुशियां मनाइए,आप भी देश के लिए कुछ कर रहे हैं।” चुन्नीबाबू जानते है मेरे मन की बात कोई समझे या न समझे श्रीमती जी जरूर समझ जाती है,समझे भी क्यों न,दोनों परिवार के विरुद्ध जाकर प्रेम विवाह किया था,जीवन है तो पति-पत्नी में नोंक-झोंक तो होगा ही यही तो  प्रेम का आदर्श उदाहरण है।

यही सोचते हुए चुन्नीबाब अपने परिवार के साथ लगभग रात दस बजे घर पहुंचते हैं। जैसे ही घर में प्रवेश करते हैं, प्रोमोटर का फोन आता है, प्रोमोटर फोन पर बताता है कि आपने जिस फ्लैट को बुक किया है उस फ्लैट को खरीदने में पूरे दाम के अतिरिक्त बारह प्रतिशत जीएसटी देना होगा,स्टाम्प ड्यूटी और म्युनिपालिटी फीस अलग से देना होगा। प्रोमोटर की बात सुन एक समय तक लगा है उसे उल्लू बनाया जा रहा है।चुन्नीबाबू ने इस तथ्य की जानकारी गूगल गुरु से हाशिल करता है।

नए फ्लैट पर बारह प्रतिशत जीएसटी सही निकलती है। फ्लैट के लिए अतिरिक्त कितना देना पड़ेगा,जब हिसाब निकालता है तो पता चलता आठ लाख दस हजार अतिरिक्त देना पड़ेगा। चुन्नीबाबू का सिर चक्कर देने लगता है। वैसे ही इस फ्लैट के चक्कर में उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा था ऊपर से अतिरिक्त जीएसटी और फ्लैट रजिस्ट्रेशन की फीस  चुन्नीबाबू को फिर से आर्थिक नीति पर सोचने पर मजबूर कर देता है। जब वह बात श्रीमती को बताते हैं तो उसकी पत्नी जवाब देती है,अपने लिए न सही देश के लिए ही देना तो पड़ेगा ही इस बात को सुनकर चुन्नीबाबू आग बबूला हो जाते हैं। मन ही मन बड़बड़ाते है,देश  के नाम पर क्या अपने को बेच दूँ ?

लेखक - अजय चौधरी


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