सेक्टर-7 में मिनी भी : भाग - 2




जिस मां के दो शावक हों, उसने दूधमुहीं को पालने का निर्णय खुद ब खुद कर लिया...उसके ऐसे न जाने कितने फैसलों पर आज तलक ताना दिया जाता है कि असली नारीवादी तो तुम हो, जो कभी विरोध नहीं किया अपनी बीवी का...

अब क्या कहूँ..ये अपन का इकतरफा फैसला था कि वो मेरी ईश्वरहीन सोच में दखल नहीं देगी और न साथ में मंदिर मंदिर घुमाएगी...और न मैं उसकी जय जय गणेश की आरती या साल के 110 व्रतों में चूँ करूंगा..बाकी दोनों का कुछ भी किया धरा हम दोनों का..तो जी हमने भी मिनी के चक्कर में सुबह की बेहद थकान वाली नींद पर माटी डाल दी..यानी मिनी को पालने में अपन को कोई गुरेज नहीं...खैर..ये थोड़ी देर में..

सितंबर में पूर्णिमा के पिता गोलोकवासी हुए तो पूर्णिमा के रुदन में मैडम भी शामिल..फिर काफी समय अपने को अकेले रहना पड़ा...उस परिवार से अपना देखा देखी का भी संबंध नहीं था.. पड़ोस वाली सामाजिकता से अपना कोई लगाव कभी रहा ही नहीं..कई अच्छे बुरे मौकों पर ही पड़ोसियों को पता चल पाता कि यह इंसान भी इसी दुनिया में है...

दहिया परिवार में बेटी ने जनम ले लिया है ..पूर्णिमा से ही पता चला..उस दौरान विश्व भर में जितनी पैदाइश हुई होंगी, उसी खाते में पड़ोस का मामला डाल भूल गया..

अकेले रहने पर अपने को सब मंज़ूर था लेकिन रसोई में घुसना बिल्कुल मंजूर नहीं था.. दिन में जैसे तैसे ..रात के लिए आफिस में कैंटीन...या एक्सप्रेस-जनसत्ता वालों का टिफिनबॉक्स...
एक दिन दरवाज़ा खड़का.. मेरे साथ दरवाज़ा भी चौंक गया.. देखा तो दहिया साहब भोजन की थाली लिए खड़े हैं..पूर्णिमा की सामाजिकता को नमन कर हरियाणवी भोजन ग्रहण किया...

लेकिन रोज रोज की बंदिश या डिस्टरबेंस अपने को रास नहीं आता था, तो जनाब को कई बार खटखटा कर लौट जाना पड़ा...कई बार मित्र के साथ मूवी भी देखी जा रही होती..उस दिन ऑफ था तो टीचर जी ने बुलावा भेजा कि यहां आ कर खाना खा लीजिये..संदेसिया जो भी रहा हो, आग्रह जोरदार था...सकुचाते हुए वहां कदम धरा..पड़ोसियों वाले अंदाज़ में बातचीत..बच्ची पालने में..टीचर जी रसोई में, बीच बीच में ..खाना ठीक बना है न..जैसा कुछ भी..पूर्णिमा कह रही थी आप बहुत कम बोलते हो..अब आप यहीं आ कर खा जाया करो..उन दो चार दिन में ही पता चल गया कि दहिया साहब बहुत भले इंसान ही नहीं, बाकायदा गऊ हैं...तो मैडम तड़क...भड़क...कड़क..

कुछ दिन बाद हम फिर परिवारी हो गए..उधर मैडम के स्कूल शुरू..बच्ची का हमारे यहां रहने का हो ही चुका था..टीचर जी सुबह सात बजे स्कूल के लिए निकल जातीं क्योंकि स्कूल पहुंचने के लिए कई बसों की सवारी करनी होती...

राजीव मित्तल को रात दो बजे घर पहुंच कर पढ़ना ज़रूर होता..तो नींद आती चार बजे.. तीन घंटे बाद ही नींद तोड़ दी जाती..मिनी की मां अपने दुलारों को स्कूल भेजने में जुटी पूर्णिमा का इशारा पा कर अपने कलेजे के टुकड़े को मेरे बगल में डाल जाती, तो चेहरे पर ज़रूर मुस्कान होती होगी..हम्म बड़े पत्रकार बने फिरते हैं..और फिर बच्ची की अठखेलियाँ शुरू..और मैं उसको सिर्फ निहारता रहता दोबारा नींद में जाने तक..(जो पता नहीं अब कब नसीब होनी थी)...हां..मुझे  मिनी जो मिल गई थी...

जारी...

By -राजीव मित्तल 



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