कविता : तब इक दफ़ा और मेरा कत्ल होता है।



तुम्हें देखते हुए, 
जब मेरी नजरें... 
तुम्हारे भौंहों के बीच, 
उस छोटे से, 
लाल बिंदी पे जाती है न, 
तो एक पल के लिए, 
धड़कने थम सी जाती है... 
सांसें रुक जाती है... 
हवाएं गुम हो जाती है... 
सूर्य मंद हो जाता है... 
धरती स्थिर हो जाती है... 
सब गतिविहीन हो जाते हैं... 
और मैं शून्य हो जाता हूँ... 
तब इक दफ़ा और 
 मेरा कत्ल होता है.... 
मैं हर रोज, 
हर रात... 
जानां, 
ऎसी ही मौत मरना चाहता हूं....

Sumit Jha

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