शराब वो कब की छोड़ चुका था पर जितनी पी डाली, उसका कर्ज तो उतारना ही था।





काफी दिनों बाद जाना हुआ सर्वोदय एन्केलव..बेनू ने आदतन हुक्म दागा.....भैया..पारुल को फोन करो.. कुछ समझ में नहीं आया..पूछा तो बोली तुमने घर जो शिफ्ट किया है...नम्बर नहीं मिला होगा...उसने मुझे कर दिया...लो..लगाओ... पारुल...मैं .....उसकी आवाज ...तुम कहां थे इतने दिनों से..विभाकर....!!!!

बिजिनेस इंडिया टीवी उर्फ टीवीआई पंचशील एनक्लेव से उदय पार्क शिफ्ट होने की तैयारी में था..लखनऊ से लौट प्लान की गयीं कई सारी स्टोरी आनन्द जी के सामने फेंक रहा था, तभी वहां लंगूर सा बैठा नया चेहरा बीच में कुछ बोल पड़ा...जी में आया घुमा कर दूं...विभाकर ..नया राइटर.. आंखों पर मोटे लेंस का चश्मा...खसखसी दाढ़ी...भूपेन हजारिका  सी खरखराती आवाज...दुबली काया.....

अगले दिन उदय पार्क आफिस में टकराया.. यार...बहुत भूख लगी है.. नीचे उतर कर थोड़ा आगे बढ़े तो कांशीराम की फोटो लगा बीएसपी ढाबा। भाई ने पेल कर खाया..

....विभाकर झा आजाद.....जेएनयू का पैदायशी शैदाई.....फलस्तीन पर डॉक्टरेट....पिता अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद्....एक भाई राजदूत..

बाद में पता चला कि मैथिल पंडत.. ऐसा-वैसा नहीं भयंकर दारूबाज...इलाज भी करा चुका है। की- बोर्ड पर हाथ कांपते हैं। लेकिन बेहद जीनियस और बातों का बादशाह। अक्खड़ इतना कि सब पनाह मांगते..

इस चैनल से पहले टाइम्स आॅफ इंडिया में पक्का हो गया था। लेटर लेने को यहां-वहां चक्कर काट रहा था। धड़ाक से एक केबिन में घुस वहां विराजमान महाप्रभु को कागज पकड़ाया....आप उधर जाएं......लड़खड़ाती आवाज निकाली....गलत आदमी के पास आ गया सॉरी..... आवाज और जालिम के भभके ने पोल खोल दी। बाहर खुद आया या उठा कर फेंका गया..पता नहीं।

इस बीच ताज मानसिंह में धुंआधार पार्टी और चैनल स्टार्ट। माहौल इतना शनदार कि काम सीखते देर न लगी और कुछ महीने बाद बुलेटिन अपने हवाले। तब तक दिन हो रात हो...हम दोनों साथ-साथ टूलते। अब रात की ड्यूटी यानि सुबह का बुलेटिन बहुत रास आने लगा। एक दिन चैनल हेड को बोला....मुझे पूरी तरह रात का कर दो नंदन....मरवाओगे क्या...मुकदमा हो जाएगा...लेकिन क्यों.......अकेले काम करने का मजा आप क्या जानो। स्क्रिप्टिंग से लेकर एंकर स्क्रिप्ट सब कुछ.... छह घंटे एक सांस में। ग्राफिक्स, साइड बार और एडिटिंग के लिये मिल गया चोटीधारी गोपाल शर्मा....नायाब साथी। अनुवाद में कोई दिक्कत आती तो अंग्रेजी वालों को पकड़ता।

अगले साल जून में विभाकर एक शाम अपने घर पकड़ ले गया....शादी की वर्षगांठ बता कर। पहले जेएनयू में टहलाया, फिर घर, जो वहीं-कहीं था। पारुल से मिलवाया। काफी मिलनसार और हंसमुख। दोनों का आपस में बेहद दोस्ताना...इतना कि उसके मुंह की चुभलायी खैनी अपने हाथ में लेकर फेंकती। पारुल के हाथ का बेहद स्वादिष्ट निरामिष भोजन और बढ़िया शराब। रात को 12 बजे घर जाते समय हालत खराब। स्कूटर चलाते दिल कांप रहा.... 20 किलोमीटर का सफर जैसे तैसे पूरा किया।

एक दिन जिद पकड़ ली कि रात की ड्यूटी में साथ काम करना है। यहां यह घबराहट कि घड़ा भर नीट पीने के बाद मेरे किस काम का होगा वो। लेकिन जिद पर आ गया। जनेऊ हाथ में थाम कर शपथ ली कि सारा प्रोग्राम काम खत्म करने के बाद। तो बात पक्की ...उसके लिये आलू का भरता और परांठे मेरे घर के...वो चिकेन का इंतजाम करेगा। नौ बजे उदयपार्क पहुंचा तो ढाबे पर विराजमान। अबे कब से इंतजार कर रहा हूं तुम्हारा...आवाज से समझ गया कि भाई ने आचमन कर लिया है। दिल धड़कने लगा बुलेटिन की सोच कर.... परेशान मत हो यार थोड़ी सी ली है। चले तो ढाबे वाले ने इशारा किया...अद्धा लील लिया है। सीढ़ियों पर लड़खड़ाया तो दिल में तम्बूरा बजने लगा।

ऊपर पहुंचते ही महाराज कुर्सी पर ढेर...उसके बाद किसी नामुराद से हाथापाई की नौबत। बाल नोचने की स्थिति आन पहुंची थी। बात इतनी बढ़ी कि चैनल हेड फोन पर बोले-मैं आ रहा हूं। उससे पहले ही गाड़ी मंगवा कर विभाकर को लदवा घर भेज दिया और नंदन को किसी तरह विदा किया। खुद मैं कार्पेट पर हाथ जोड़ कर बैठ गया....द्रोपदी की रक्षा करने वाले प्रभु..... आज मुझे बचा लो। पांच मिनट बाद ही गोपाल शर्मा हाजिर। उसका घर अपनी बिल्डिंग से दो-चार मकान छोड़ कर था...टहलने निकला था, पकड़ में आ गया..

विभाकर अपने अंदाज में चलता रहा। शादी की अगली वर्षगांठ पर फिर न्योता। इस बीच मैं एक बड़े एक्सीडेंट का सामना कर कुछ दिन अस्पताल में गुजार कर ट्रॉमा में चल रहा था..विभाकर का अंदाज अपनाने का दंड....

इस बार की दावत में उसके घर मेरे अलावा एक और। सब बढ़िया चल रहा था कि अचानक वातारण में कुछ तनाव दिखा....उन सज्जन से उठने का इशारा कर निकल लिया। इस बीच मियां-बीबी जसोला के अपने घर में शिफ्ट कर गये। लेकिन तनाव जारी रहा। कभी एक घर से गायब तो कभी दूसरा। पारुल कई बार मयूरविहार आयी....पूर्णिमा से अपना दुख शेयर करने। विभाकर का हाल अनाथ से भी बदतर। रात को कई बार जसोला के राहगीर यहां-वहां पड़े को किसी तरह घर पहुंचाते।

काफी समय बाद दोनों में मेल-मिलाप हुआ। इधर चैनल की हालत दिन ब दिन बिगड़ती देख बुझे मन से सहारा टीवी की तरफ मुंह करना पड़ा।

विभाकर से यदाकदा फोन पर बातचीत हो जाती। उसने भी टीवीआई छोड़ दिया....एक दिन सहारा आया....पर वहां उसका कुछ हुआ नहीं। एकाध बार और हाय-हेलो हुई। पारुल घर आती रही। साल खत्म होते-होते सहारा में मन ऊबने लगा। उदयन जी ने अमर उजाला पहुंचते ही बुला लिया। जब तक उदयन जी का साथ रहा, समय ठीक कटा, नोएडा में आते ही जैसे कब्र में पांव धर दिये हों । विभाकर को बिल्कुल ही भूल गया।

पारुल की आवाज कानों से टकरा कर गिर रही थी। हां तो ....विभाकर तुम अक्सर दरभंगा की बातें सुनाया करते थे। तुम वहां किसी कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाते थे। कुछ ही दूर तुम्हारा गांव। आम के पेड़ और धान के खेत। मछली से भरे पोखर। तुम बोरा भर आम चूसते थे और जी भर कर मछली खाते थे। टीवीआई का सुना तो दिल्ली आ गये। हम-तुम तीन साल साथ-साथ रहे। तुम मुझे कई बार अपने घर ले गये, पर मेरे यहां कभी नहीं आए । पारुल अकेले ही आती थी। तुम्हें भूूख बहुत लगती थी.....आधी रात को अक्सर हम ग्रीन पार्क में परांठे खाने जाया करते थे। उन गर्मियों में तुमने अपनी पसंद की सैंडिल दिलायी थीं मुझे....पर देखो न! उसी रात एक्सीडेंट में बेहोश हो जाने के बाद कोई उन्हें उठा ले गया।

टीवीआई बंद होने के बाद तुम मेरे पास सहारा भी आए थे लेकिन तब तक मैं अपनी दुनिया में पूरी तरह खो चुका था। तुमको नोएडा के 12 सेक्टर में एक ठेले पर चाय पिला कर बस में धकेलने की कोशिश । मेरा उदासीन रुख तुम्हें उदास कर रहा था ...अबे पान तो खिला दे। एक और दिन मेरे सामने तुम बस से उतरे। मैं रिक्शे पर बैठ कहीं जा रहा था। हाथ हिला दिया बस। उसके बाद....

पारुल ने फोन नहीं काटा है .......... कई महीने घर में बैठने के बाद तुम दरभंगा कॉलेज फिर से ज्वायन करने दिल्ली से निकल पहले पटना पहुंचे। एक दिन-एक रात बहन के पास रहे। सुबह किसी वक्त तुम भरपेट नाश्ता कर बस में बैठ गये। खैनी बनायी, मुंह में डाली और खिड़की से सिर टिका कर ऊंघने लगे। कितना टाइम लेती है बस दरभंगा पहुंचने में?.....मुजफ्फरपुर तक दो घंटे और वहां से दो घंटे और। चार घंटे बाद बस दरभंगा बस अड्डे पर। सब यात्री उतर गये....पर, तुम बैठे रहे। कंडक्टर ने देखा तुम खिड़की पे सिर टिकाये बैठे हो....आंखें एक टक सामने देख रही हैं।

हां पारुल बोलो, अब मैं सुन रहा हूं तुम्हें .... शराब वो कब की छोड़ चुका था...पर, जितनी पी डाली, उसका कर्ज तो उतारना ही था! रास्ते में कहीं दिल ने धड़कना बंद कर दिया। लाश थाने में जमा करा दी गयी। किसी ने पहचाना तो गांव खबर की गयी। मुझे फोन पर सारी बात नहीं बतायी, बस इतना ही कहा फौरन आओ। मैं दरभंगा पहुंची। लाश मुरदाघर में रखी थी। वहां से लौटी...तुम्हें-पूर्णिमा को तलाशती रही। राजीव....विभाकर मर गया.....पारुल फोन पर भरभरा कर रो रही थी। तीन साल बाद रांची में विभाकर की सबसे बड़ी बहन से मिलने घर गया......आंसू उनके भी नहीं रुक रहे थे.



By - राजीव मित्तल 

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