कविता: मोची





हाथों में लेकर काले जूते, बूढ़े मोची ने हर ओर से देखा,
बैठ गया फ़िर,सिकुड़ गई कुछ माथे की रेखा।

देखों बाबा , कुछ उम्मीद कि बन पाएँगे?
मेरे जूते ये, क्या फिर चल पाएँगे?

अरे बिटिया तुम फ़िकर तनिक न करना,
समय लगेगा धैर्य ज़रा तुम धरना।

नया नवेला इनको मैं कर दूंगा,
दाम मगर चालीस रुपये से एक न कम लूंगा।

चालीस रुपये!
देखो बिटिया,

फ़िज़ूल दाम नहीं कुछ भी कहता हूँ,
जितना खर्चा आएगा उतना ही लेता हूँ।

अरे नहीं बाबा ,बात नहीं जो तुम समझे,
तीन जोड़ी जूतों की पूरी सिलाई,

और क्या यही तुम्हारी कमाई?
इतना भी बिटिया कौंन है देता,

जैसे तैसे रोटी हूँ काम लेता।
क्यों बाबा औलाद नहीं तुम्हारी कोई?

है ना बिटिया,
चार बेटियाँ ,जिनका कन्यादान किया,
दो बेटे जो दूर देश कमाते हैं।

इतना सुन कुछ सोचा मैंने बुज़ुर्ग की हालत पर,
आज कि कुछ कार्यरत औलादों की लानत पर।

निरंतर काम में अपने रमा हुआ था,
सुई का निशाना पहले से सधा हुआ था।

चमड़े की चप्पल को ऐसे सिलता,
मानों यही एक काम था जिससे उसको सुख मिलता।

इतना सोच फिर मैंने पूछा,
पढ़े लिखे हैं सब क्या ?

हाँ बिटिया सबको विद्या दी है,
इसी कमाई से सबने शिक्षा ली है।

बेटे बारहवीं पास हैं,बेटियाँ नहीं कोई अनपढ़।
मुस्कान दौड़ गयी चेहरे पर मेरे,
जाने क्या था बूढ़ी काया को घेरे।

हाथों में ब्रश और पॉलिश नहीं रखा,
बच्चों को नहीं लगाने दिया घरों के फेरे।

इतना कह कर शक्कर की चिड़िया खाई,
और फिर पानी पी प्यास बुझाई।

रहा नहीं गया फिर मैंने पूछा,
और बाबा तुम्हारी पत्नी ?
सिकुड़ गई कुछ माथे की रेखा।

इतना सुन बोला,
गुज़र गयी बारह साल अब बीते,
बोली बूढ़ी काया पानी पीते-पीते।

फिर बाबा बच्चे तुम्हारे खर्चा नहीं उठाते क्या?
अपने फ़र्ज़ नहीं निभाते क्या?
बिटिया पैसे से निभते हो रिश्ते,
साथ,चैन,और सुख हो मिलते,
तो फिर तो निभते हैं रिश्ते।

इतना कह लगा अवज़ार निकालने,
खींच-खींच धागे को लंबा किया,
और फिर नाप जूते का लिया।

क्यों बाबा ऐसा क्यों कहते हो?
सुख से संतापित क्यों लगते हो?
नहीं बिटिया ,

बूढ़ी आँखे अब बच्चों की शकलें कहाँ पाती हैं,
पर उनके सुख को देख नित हर्षाती हैं।

फिर पूछा मैंने,
अच्छा कितना कमा लेते हो दिन भर में?
ज्यादा नहीं मगर दो-तीन सौ पा जाता हूँ,

जब दिन भर 'बूट पॉलिश' राग सुनता हूँ।
इतना कह बोला ,

लो बिटिया तुम्हारे जूते हो गए अब चोक्खे,
कोई कितना चाहे धरती पर इनको ठोके।

सौ का नोट दिया मैंने ,
तो लगा टटोलने जेबें अपनी।

बाबा रख लो जो भी देती हूँ,
समझ गयी मैं ईमान नहीं अमीरी की कथपुतली।
कमाई तुम्हारी है ये,खैरात न देती हूँ।
सुन कर ,सिकुड़ गई कुछ माथे की रेखा।
कुछ ऐसे बूढ़ी आँखों ने मुझको देखा।

संकोच करो न तुम थोड़ा भी,
तुम्हारी मेहनत से कीमत ज्यादा न दूँगी,
खुद्दारी का तुम्हारी मैं धिक्कार न लूँगी।
        -प्रिंसी मिश्रा

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