कहानी : तुम मुझमें कही बाकी रहना।


बीते लम्हों की याद जब मन की खिड़कीयों पर दस्तक देती है और यादों को हवा बनके छूती है तो जाने दिल कितने दिन कितने महीने कितने घंटे जोड़ने लगता है।

      आलमारी से कुछ खोजते हुए मेरी अंगुलियाँ बरबस मेरी उस  डायरी से टकरा गई और फ़िर हाथ तो उस पर सील ही हो गया ! जेहन मे उसका ख़याल आया और मन मुस्कुराते हुए कहा चलो आज एहसास की धूप दिखाते है तुमको !
और फ़िर डायरी को सीने पर रखकर यादों में अपनी हसरतें टाँकते चले गये....

       वो बार बार अपनी उँगुलियो को मोड़ रही थी ,ये तभी होता है जब इंसान के जेहन मे घबड़हाट होती है उसके चेहरे पर घबड़हाट साफ झलक रही थी ,बार बार घड़ी देखे जा रही थी, मै बीस मीटर की दूरी पर ईक चाय की दुकान में बैठकर सब देख रहा था.अब ज्यादा इंतजार कराना भी मुझे अच्छा नही लगा ,इयरफोन से सुन रहे गाना....तेरे दर पे सनम चले आये को कान से इयरफोन को अलग किया !

पास जाकर थोड़ा बगल से मैंने बहुत हल्के आवाज दी !
रीत..!

वो अपनी बायीं कंधे को थोड़ा नजाकत देते हुए मेरी तरफ़ देखी..
और मुस्कुराती हुई पास खड़ी अपनी सहेली का हाथ पकड़कर दबा दी.!
रीत की सहेली मेरी तरफ़ देखने लगी.
हाय..मै लोकेश....
वो भी मुस्कुराने लगी....
तो चले....
कहाँ..
बनारस अापका शहर..मै कहाँ कहूँ चलने को...रीत के कंधे में ईक छोटा सा बैग लटक रहा था...
धीरे धीरे अब हम तीनो आगे बढ़ने लगे... झिझक तीनो के चेहरे पर थी..
पर तोड़ना जरूरी था !
" पहले विश्वनाथ मंदिर चले क्या..?
रीत की सहेली ने सहमति में सिर हिलाई..
बिश्वनाथ मंदिर ,मानस मंदिर ,
दुर्गाकुंड मंदिर , संकट मोचन मंदिर घूमने के बाद ईक जगह ठेले वाले को देखा वो गरम समोसे बना रहा था मैंने रीत की तरफ़ देखा और कहा क्यों न आज आपकी पसंदीदा चीज़ खायी जाये , फ़िर हम तीनो मिल समोसा खाये!  हम लोग शाम के 3 बजे अस्सीघाट पहुँचे ! ये और बात थी की इतने टाईम में रीत एक बार भी मुझसे नही बोली... बस कनखियों से देख मुस्कुराती रही  !
             अच्छा अापका क्या नाम है...? मैंने रीत की सहेली से पूछा !
"क्यों मेरे बारे में रीत कभी आपको नही बताई क्या !
नही..
मेरा नाम कल्पना है ! 
"बहुत सुंदर नाम है..मैंने कहा , और आवाज़ तो आपकी बिल्कुल रीत के जैसी है..!
कल्पना जी.... क्या रीत बिल्कुल चुप रहने के लिये बुलाई है...

"लोकेश जी आपकी बात तो रीत से होती थी न मोबाइल पर.. और फेसबुक चैट पर.. बस करीब से आपको देखना चाहती थी बेचारी रीत जो वो भी पूरा हुआ..
"तो क्या.....
आप एक काम कीजिये मै यही घाट पे बैठती हूँ... आप रीत को लेकर नाव से गँगा जी की सैर कर आइये....!
पर मै कुछ आपसे कहना चाहती हूँ...?
पता नही क्यों कल्पना का चेहरा उदासी में बदल गया...
क्या बात है कल्पना जी कहिये...
सच तो आपको बताना ही पड़ेगा..बात दरअसल ये है की...
" अरे बोलिये चुप क्यों हो गई !
कल्पना ने ईक बार रीत को देखा और फ़िर....
" लोकेश जी फोन पर जो आपसे बाते होती थी , जिसे आप रीत समझते थे वो रीत नही बात करती थी वो मै बात करती थी ,
"क्या..? दिमाग घूम गया मेरा...ये क्या बात हुई !
जी.. पर आवाज़ सिर्फ़ मेरी होती थी पर दिल की आवाज़ रीत की होती थी वो जो कहती मै वही आपसे बात करती...
ये क्या ड्रामा है कल्पना जी ,क्या आप दोनो मेरा मजाक उड़ाने के लिये बुलाई है ,
   "नही लोकेश जी सच्चाई तो ये है की रीत बोल सुन नही सकती सिर्फ़ समझती और इशारों में बात करती है , ये बचपन से......
उफ़्फ़्फ़....!
आपको याद होगा लोकेश जी रीत के गलती से आपके मोबाइल पर कॉल चला गया...ये आपकी आवाज़ सुनी.क्योंकि घर पर कभी कभी कान वाली मशीन लगाती थी थोड़ी शरारती है रीत...कई बार ये आपको परेशान की फ़िर इसने मुझे बताई की मै आपसे रीत बनकर बात करूँ... और फ़िर मै आपसे बात की और फ़िर आपकी रीत की दोस्ती आगे बढ़कर फेसबुक पर पहुँच गई...दिल जब अपने आप पे आता है तो किसकी सुनता है दिन का चैन और रातों की नींद गँवाता है मैं पूछी भी थी रीत से की कही तुमको...प्यार...पर वो इनकार करती रही...पता नही क्या आपको लेकर पागलपन जागा इसके अंदर...ये तो मै भी नही बता सकती , कैसे आपसे मिलने की ठान ली !
इस बार )कल्पना की आँखे भीग चुकी थी !

मै बरबस ही कल्पना के पीछे से कंधे पर हाथ रखा और सामने आकर बोला !
तुम भी चलो कल्पना नाव में , जब दो दिलो की बात जानती हो तो तुमसे क्या छिपाना !
 "नही आप दोनो जाइये.. ये कल्पना की तरफ़ से आप को और रीत को सरप्राइज समझिये !
अस्सीघाट की सीढियों से उतरती रीत को मै देखे जा रहा था जैसे सूरज की साँझ की किरण ईक ईक सीढिया उतर रही हो..अगले पल रीत और मै नाव में थे....
मै रीत को देखे जा रहा था , चैट पर जितनी भी फोटो भेजी थी किसी फोटो में ब्यूटीप्लस कैमरा का सहारा नही ली थी...ना आज रीत के चेहरे पर ढाई किलो का कोई मेकअप था , सादगी इतनी की रात चाँद जैसे गँगा के पानी में शांत उग आया हो ! ऐसा क्या था मुझमें... क्यों इतनी आसक्त हुई मेरे लिये कुछ समझ नही पा रहा था मै !
मै रीत के बिल्कुल करीब बैठा था.
मैंने इशारों में पूछा...
रीत....
कैसी हो....
वो मेरी तरफ़ देखी और नज़रें झुका ली ,
मै फ़िर पुकारा 
रीत..
इस बार नजरे उठाई तो रीत की पलकें भींग चुकी थी..
मै बहुत हल्के से ना चाहते हुए भी रीत का हाथ अपने हाथों में लिया और इशारों से बताया की मुझे कल्पना से सब मालूम हो चुका है...मै रीत की भीगती आँखो को पोछा..! 
रिलेक्स होने के बाद मै पूछना शुरू किया...
मै आचम्भित था की मेरी हर बात का जवाब एकदम सही सही इशारों में देती थी ! जो बात नही समझ में आती उसे बैग से ईक कागज और पेन निकाल ली और उसी पर लिख देती !
मै सोच रहा था ईश्वर ने किस बात की सजा दी है रीत को....
पता नही मुझमें क्या शरारत सूझा मै इशारों में पूछा.
" मुझसे शादी करोगी 
   वो मुस्कुराकर सर झुका ली...
फ़िर अपने दोनो हाथ पकड़कर दिल से सटाकर मानो ये कर रही थी की नही दोस्ती....
फ़िर हम दोनो....घाट पर आ गये लोकेश जी अब लेट होगा अब चलना चाहिये...कल्पना हम दोनो के पास आते ही बोली ,
 कल्पना बोली.."रीत...अब तो खुश हो..
रीत मुस्कुराती हुई झेंप सी गई..फ़िर तीनो चल दिये...
अब वह मोड़ आ गया जहाँ से विदा लेना था... तीनो रुक गये..
रीत अपने बैग से दो डायरी निकाली 
एक पर मुझसे आटोग्राफ लेकर रख ली.... और दूसरी मुझे दे दी..
रीत कल्पना से विदा लेते वक़्त कुछ कही...
क्या कही होगी जो कल्पना की भी आँखे भर आई..!
लोकेश जी.." रीत कह रही है उसे भूल ना जाइयेगा ,...
इस बार हम भी अंदर से रो दिये , दिल कह रहा था अभी रीत को सीने से लगा लूँ...!मै खड़ा रहा देर तक...जब तक वो मेरी नज़रों से ओझल ना हो गई मैंने महसूस किया वो कई बार मुड़ मुड़ के मुझे देखी !
       रीत के जाने के बाद मैंने डायरी का पहला पन्ना पलटा....
"मै रहूँ या ना रहूँ तुम मुझमें कही बाकी रहना ,
मुझे नींद आये जो आखिरी तुम ख्याबो में आते रहना ,
बस इतना है तुमसे कहना....
किसी दिन वारिश जो आये समझ लेना बूँदों मै हूँ ,
सुबह धूप तुमको सताये समझ लेना किरणों में मै हूँ...
मै कुछ कहूँ या ना कहूँ तुम मुझको  सदा सुनते रहना..
बस इतना है तुमसे कहना.....!!

पढ़कर आँखों में आँसू तैरने लगे थे...नीचे देखा लोकेश और रीत लिखा हुआ था कोने में....अचानक आँखो के दो बूँद आँसू रीत और लोकेश को एक कर मिलाता चला गया.........!!

By- आकाश कुशवाहा

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