कविता : उफनती रात के उस।



मैं लिखना चाहता हूं...
किसान के खलिहान गेहूं की
पकी बालियों का जिक्र 
कसमसाती धनिये का गंध
पककर लदे जामुन की कसाहट 
पके महुए का मदहोश स्वाद.

मैं लिखना चाहता हूं...
चाहरदीवारी पर रखे गुलाबी 
गमले की फूलों पर 
मंदराती रंग-बिरंगी
उस जानी-पहचानी 
तितली की शोख आदाओं को,

मैं लिखना चाहता हूं...
ढ़लती शाम की गरमाहट 
पालतू कुत्ते की भूख की आहट 
बांस की झुरमुटों की
चुर-चुराहट से छनकर आती
पक्षियों की हंसी-ठिठोली.

मैं लिखना चाहता हूं...
उफनती रात के उस 
षणयंत्र के बारे में ..
वे सब जो, 
देर शाम तक 
अपने घर नहीं पहुंच पाएं..,
-पवन मौर्य


फ़ोटो क्रेडिट : Daniel Dal Zennaro

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