कविता: क़स्बे के कवि की मौत।








वह क़स्बे का चूतिया कवि
अंतत: बिना आवाज के मारा गया
उसे महानगर की रस्में मालूम नहीं थी
कि जब तक बड़ा,अघाया,खाया धाया
खंकारता,डकारता संपादक,मय अपने
आलोचक समूह द्वारा उसे क्रांतिकारी
घोषित न कर दे,तानाशाह को खुजली 
तक नहीं नहीं होती,वह वैसे ही उपस्थ
खुजाते हुये अध्यादेश जारी करता रहता है
सदी के नायकों के साथ हँसता रहता है
क़स्बे के नगरसेठ की तो कोई हस्ती ही
नहीं थी,जिसका,वह कवि विरोध करता रहा
वह बेचारा उसे ही साम्राज्यवाद का सबसे
बड़ा प्रतीक समझ कर सौओं कविताएँ लिख
चुका था,और उसका बाल भी उखाड़ नहीं पाया था
बिखरे,बिछड़े ग़रीब थे यहाँ,जिनकी मौतें ख़ामोश
गुजर जाती थी,वह बेचारा सभ्यता के विकास का
फ़ार्मूला तय नहीं कर पाया था

उसे पता नहीं था कि एक लुच्चे से कविता संग्रह
के विमोचन के पीछे हजारों मिनमिनाति उम्मीदें रहती हैं
जमे हुए फटीचर आलोचकों और गुरु स्थानीय
संपादकों के कुटिल आश्रय रहते हैं
और किसी कंपनी का स्पांसर रहता है
उसने तो किसी तरह वह टुच्चा सा संग्रह
प्रकाशित करवा लिया था और दर दर भटकता हुआ
आज सुबह क़स्बे की कोठरी में बिना किसी
ऐलान के मारा गया,मरते मरते यह अफसोस लेकर ही
मरा कि वह महान कवि हो सकता था,या अंतत:
टुच्चा ही रहा और टुच्चा ही मारा गया ।


By- प्रमोद बेड़िया

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