जस्टिस लोया की मौत : चुप्पी अब एक राष्ट्रीय अभियान है।




मैं स्तब्ध हूँ. मैंने कारवा की सोहराबुद्दीन केस और अमित शाह से जुडी स्टोरी अभी- अभी पढ़ी है. एक पत्रकार की सालों की मेहनत को खबर बने हुए दो दिन हो चुके हैं और सभी के मुहं पर ताले लगे हुए हैं. क्या देश में चुप्पी का कोई राष्ट्रीय अभियान चल रहा है ?

निरंजन की स्टोरी एक खौफनाक मर्डर मिस्ट्री(?) है. हत्या(?) की एक ऐसी सुनुयोजित कहानी है जिस में सब कुछ सब को पहले से ही पता था. एक जज की मौत क्या सुनुयोजित थी ?  लोया के बेटे अनुज ने अपने खत में क्यों लिखा कि 'मेरे परिवार को कोई नुकसान पहुँचता है तो उसकी साजिश में लिप्त मोहित शाह और अन्य लोग (आप जानते हैं.) इसके जिम्मेदार होंगे. यह वहीं मोहित शाह हैं जो लोया की मौत के 80 दिन बाद शोक में डूबे  परिवार को ढांढस बंधाने  आए  थे और लोया के परिवार के मुताबिक़ जिन्होंने अमित शाह के पक्ष में फैसला देने के लिए 100 करोड़ रूपये की पेशकश भी की थी .

निरंजन टाकले की यह स्टोरी  हमें भ्रष्ट हो रही न्याय व्यवस्था का मुआयना भी कराती है. घटनाओं की एक बानगी देखिये -

1-  6 जून, 2014 को अमित शाह के मामले में  तत्कालीन सीबीआई जज उत्‍पट ने शाह के वकील के सामने अमित शाह के हाजिर न होने की वजह से नाराज़गी ज़ाहिर की । हालांकि फिर उस दिन तो उन्‍होंने शाह को हाजिरी से रियायत दे दी और 20 जून की अगली सुनवाई में हाजिर होने का आदेश दिया.

2- 20  जून, 2014 को अमित शाह फिर हाजिर नहीं हुए .मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक उत्‍पट ने शाह के वकील से कहा, ‘आप हर बार बिना कारण बताए रियायत देने की बात कह रहे हैं।”’ 

3- 26 जून 2014- जज उत्‍पट ने यह तारीख मुकर्रर की. लेकिन धयान देनी वाली बात यह है कि 25 जून को  ही इनका तबादला पुढे कर दिया गया.जबकि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई ”एक ही अफ़सर द्वारा शुरू से अंत तक की जाए।”

4- इसके बाद लोया इनकी जगह पर आए. आउट लुक के मुताबिक़ वह शुरू से ही अमित शाह की उपस्थिति को ले कर नरम थे लेकिन केस को लेकर काफी गम्भीर.

5 - मुकदमे में शिकायतकर्ता रहे सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन के वकील मिहिर देसाई के मुताबिक लोया 10,000 पन्‍ने से ज्‍यादा लंबी पूरी चार्जशीट को देखना चाहते थे और साक्ष्‍यों व गवाहों की जांच को लेकर भी काफी संजीदा थे।

6- 31 अक्‍टूबर 2014 को एक सुनवाई के दौरान लोया ने पूछा कि शाह क्‍यों नहीं आए। उनके वकीलों ने जवाब दिया कि खुद लोया ने उन्‍हें आने से छूट दे रखी है। लोया की टिप्‍पणी थी कि शाह जब राज्‍य में न हों, तब यह छूट लागू होगी। उन्‍होंने कहा कि उस दिन शाह मुंबई में ही थे। वे महाराष्‍ट्र में बीजेपी की नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्‍सा लेने आए थे और अदालत से महज 1.5 किलोमीटर दूर थे। उन्‍होंने शाह के वकील को निर्देश दिया कि अगली बार जब वे राज्‍य में हों तो उनकी मौजूदगी सुनिश्चित की जाए और सुनवाई की अगली तारीख 15 दिसंबर मुकर्रर कर दी।

7-  मोहित शाह देर रात उन्‍हें फोन कर के साधारण कपड़ों में मिलने के लिए कहते और उनके ऊपर जल्‍द से जल्‍द फैसला देने का दबाव बनाते थे और यह सुनिश्चित करने को कहते कि फैसला सकारात्‍मक हो। मुख्‍य न्‍यायाधीश मोहित शाह ने खुद रिश्‍वत देने की पेशकश की थी।

8- बृजगोपाल हरकिशन लोया मुंबई में सीबीआइ की विशेष अदालत के प्रभारी जज थे जिनकी मौत 2014 में 30 नवंबर की रात और 1 दिसंबर की दरमियानी सुबह हुई, जब वे नागपुर गए हुए थे। 

9 -लोया की मौत के बाद एमबी गोसावी को सोहराबुद्दीन केस में जज बनाया गया। गोसावी ने 15 दिसंबर 2014 को सुनवाई शुरू की। मिहिर देसाई बताते हैं, ”उन्‍होंने तीन दिन तक अमित शाह को बरी करने संबंधी डिफेंस के वकीलों की दलीलें सुनीं जबकि सीबीआइ की दलीलों को केवल 15 मिनट सुना गया। उन्‍होंने 17 दिसंबर को सुनवाई पूरी कर ली और आदेश सुरक्षित रख लिया।”

10 -लोया की मौत के करीब एक माह बाद 30 दिसंबर 2014 को गोसावी ने डिफेंस की इस दलील को पुष्‍ट किया कि सीबीआइ की आरोपी को फंसाने के पीछे राजनीतिक मंशा है। इसके साथ ही उन्‍होंने अमित शाह को बरी कर दिया।

यह सारी घटनाएँ किस तरफ इशारा कर रही हैं . जिस मामले की जांच एक ही अफसर के जरिये होनी थी , उसके तीन जजों ने अंजाम तक क्यों पहुंचाया ? जज Utpat का तबादला सुनवाई के ऐन मौके पर क्यूँ किया गया ? मोहित शाह इस बात का जवाब क्यूँ नहीं देते कि क्या उन्होंने 100 करोड़ की रिश्वत की पेशकश की थी. इतना पैसा उनके पास कहाँ से आया ? किस राजनितिक आदमी ने उनसे यह पैसा देने के लिए हामी भरी थी ? क्या वो अमित शाह थे ?

इन सवालों का कोई जवाब नहीं है, क्यूंकि कोई अब सवाल करना ही नहीं चाह रहा है .

क्यूंकि स्वच्छ भारत के बाद 'चुप रहो' अभियान चलाया जा रहा रहा है .




लेखक - आशुतोष तिवारी


फ़ोटो क्रेडिट - द वायर

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