बरसों बीत गये सदियाँ बीत गई पर मोनोलिसा की बेशकीमती मुस्कान का राज आज भी राज है।





मोना लिजा की तस्वीर और उसके कुचेदार की बात आती है तो बरबस ही हमारे दिमाग में रहस्य और तथ्यों का तिलस्म ढहने लगता है  और अंत में सब गडमड्ड हो जाता है. फिर जिज्ञासा को शांत करने के लिए दिमाग स्वत ही स्फूर्त हो, सरपट दौड़ जाता है. मोनालिसा, फ्लोरेंस के एक रईस सिल्क व्यापारी की पत्नी थी. 

कितना दिलचस्प है उसका नाम फ़्रांसेस्को देल जियोकॉन्डो था, पर आजतक विद्वान कई शोध करने के बाद भी कहते हैं की फ़्रांसेस्को गुमनाम था. पाश्चात्य के पड़ताल मीटर पर ये बात मापी नहीं जा सकी. दुनिया के सामने मिसाल देते हुए किसी काल्पनिक व्यवसायी घराने से नहीं जोड़ा. यही बात पश्चिमी देशों को अमित धरोहर है.

उसी समय पुनर्जागरण काल का पिक समय चल रहा था. इसी दौर में एक प्रतिभावान विद्वान लियोनार्डो द विंसी भी देश के कोने में अपने हुनर को चमका रहा था. और बहुत ही कम समय में कला और ज्ञान के दम पर उभर कर राष्ट्रीय कलाकार का चेहरा बन गया. विन्ची के संघर्षों को छोड़ दे और सीधी तस्वीर पर चले तो बेहतर होगा. तस्वीर मोनालिसा की है या किसी और की ..?

फ्रेंच वैज्ञानिक पास्कल कोटे ने करीब 10 साल शोध करने के बाद जो नतीजे लॉव्र म्यूजियम को सौंपे. उसे जानकार दुनिया चौक गई. 6 से 7 शताब्दियों से जो इतिहास के पन्नों पर तैरता आ रहा है. वो एकदम से गलत कैसे हो सकता है. तस्वीर मोनालिसा की नहीं मोनालिसा, लीज़ा घेरार्दिनी की है. पास्कल के अलावे अन्य वैज्ञानिक भी दावा करते है कि शुरुआत में तस्वीर किसी और महिला की लगती है. चुकी पेंटिग में कई परते है. शुरूआती परत पर लगातार 15 साल रंग भरा जाता रहा. इस दौरान जो चित्र अंतिम रूप से तैयार हुआ. वो मोना लिजा का हो गया. विची को इस कृति की मुंहमांगी कीमत से कई गुना अधिक कीमत मिल रही थी, परंतु उसने कभी इस कृति को बेंचा नहीं.

हालाँकि, हम उन किवदंतियों पर नहीं जायेंगे, जिसमें कहा गया है कि प्रेम और विरह की जो कविता विन्ची ने कूची से कैनवास पर लिखी. उसमें अपनी भी सूरत उकेर दिया. इसका कोई प्रमाण नहीं है. और रोमांच के बीच इस चीज को जान लेना आवश्यक होगा की, किसी भी पेंटिग या कला को जिस भाव-भंगिमा और परिस्थिति में देखा जाता है. उस अनुरूप परिणाम दर्शनीय होते है. ये बात मोना लिजा के लिए अलग नहीं है. हाँ, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है की आप उसके प्रभाव में आ जाते है. जिससे निर्णय पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाता है.

इतने से ही बात ख़त्म नहीं होती है. जिस रहस्यमय बला को मोनालिजा पेंटिंग कहते है, तुलना करने पाएंगे की, मोना पेंटिंग को जिस पूर्वाग्रह से देखेंगे, वैसी ही दिखाई देगी. दरअसल इस तस्वीर की मकबूलियत की यही एक वजह है.

कोटे के अनुसार, जिस खूबसूरत बला की पेंटिंग सन 1503 से शुरू होकर 1517 ईस्वी तक बनाई गई. और जिस मोनालिसा की अद्भुत तस्वीर हम देखते हैं, उसमें सबसे ज्यादा ख्याति प्राप्त मोनालिसा के रहस्यमयी मुस्कान की है. इसके अलावा विन्ची ने विटरूबियन (निर्गुण), द लास्ट सपर,मेडोना और वर्जिन ऑफ़ द रॉक्स भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना की मोनालिसा. विटरूबियन (निर्गुण) की पेंटिंग बनानेसे पहले का किस्सागोई जानकार आप हैरत में आ जायेंगे. मानव शरीर की जटिल को समझने के लिए लियनार्डो रात के अंधेरे में कब्रिस्तान से शव खोद कर, चीरफाड़ करने के बाद रेखांकित कर लेता था बाद में उसे कूची से उकेरता था.

ये बात दिमाग को और घाल मेल कर देती है, प्रसिद्ध इतालवी इतिहासकार सिल्वानो विंसेटी ने दावा किया है कि मोनालिसा की तस्वीर में एक पुरुष मॉडल है।

बरसों बीत गये सदियाँ बीत गई, इतना कुछ लिखा गया, पर उसके साथ ही मोनालिसा की बेशकीमती मुस्कान के पीछे का राज और गहराता गया. आज 21 सदीं के दूसरे दशक में प्रवेश करने वाले है फिर भी पहेली अनसुलझी ही रहा.



लेखक - पवन मौर्य 

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