सरकारी स्कूल में पढ़ाना सिर्फ पढ़ाना भर नहीं होता यहाँ पढ़ना होता है हालात को।





सरकारी स्कूल में पढ़ाना सिर्फ पढ़ाना भर नहीं होता यहाँ पढ़ना होता है हालात को। जिनमे हमारे बच्चे रह रहे हैं जी रहे हैं। और प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाना तो विश्व के कठिनतम कामों में से एक है। जिनमें एक ही क्लास में एक को 20 तक पहाड़ा याद है दूसरे को गिनती की समझ तक नहीं है। मानसिक स्तर पर देखा जाए तो हर कक्षा में कम से कम पांच ग्रुप बनेंगे। प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में फर्क सिर्फ यह है कि वे डिसिप्लिन मेंटेन करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

 यहां पर हाथ उठाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता, चाहता हूं कि वह स्कूल से डरे नहीं, स्कूल को प्यार करें। मगर कैसे? कुछ बच्चे तो क्रूर शब्दों में कहूँ तो मंदबुद्धि है। अतिरिक्त ध्यान चाहते हैं। कई बार सख्त होकर डांट देता हूं तो बस रो देते हैं। कई तो कॉपी पेंसिल भी नहीं लाते हैं ......पर अक्सर यह मेरे लिए कच्चे पक्के बैर जरूर लाते हैं। खैर इन के लिए  ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि ऐसी मुसीबत में कभी न डालें कि तुम्हारी यह निश्छलता खो जाए। इतने ताकतवर बनो कि हर तकलीफ तुम्हारे आगे घुटने टेक दे।





पिछले सप्ताह हमारे विद्यालय परिक्षेत्र के PEEO सा'ब कथेसर राजस्थानज औचक निरीक्षण पर आये। बच्चों का शैक्षणिक स्तर परखा। और गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने हम छात्राध्यापको  को प्राइमरी के बच्चों के लिए विशेष रूप से कहा कि बच्चों में सृजनशीलता का विकास, विश्लेषण की क्षमता बढ़ाने हेतू पेंसिल घुमाकर चित्र बनाओ, चित्र में रंग भरो आदि गतिविधिया करवाइये। सरल एवं स्थानीय भाषा में कहानियां द्वारा उनमें रचनात्मकता लाई जाए तो गुरु जी के विचारों और सुझावों को ध्यान में रखते हुए उन को सिखाने की कोशिश कर रहा हूं।


बदली हुई परिस्थितियों के रूप में शिक्षा में परिवर्तन होना जरूरी है। तभी विकास की गति तेज होगी। वर्तमान में शिक्षण क्रियाओं में विद्यार्थी केंद्र के रूप में हैं। हमारे सिखाने की प्रक्रिया इस प्रकार हो कि विद्यार्थी स्वयं अपने अनुभव के आधार पर समझकर ज्ञान का निर्माण करें।उनको सीखने की प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा स्वतंत्रता दे रहा हूं।




मेरी कोशिश यही रहती है कि बच्चों को घर जैसा माहौल मिले क्योंकि बालक घर के आंगन से खेलता हुआ जब शुरू शुरू में विद्यालय के माहौल में प्रवेश करके कक्षा कक्ष की ओर बढ़ता है तो उसके लिए सारा वातावरण एकदम नया होता है। बच्चों को सर्वप्रथम देखना,सुनना, बोलना फिर लिखना के क्रम में सीखने और सिखाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास कर रहा हूं। 

             यहाँ विद्यालय में कार्यरत गुरुजन यदि प्रयास करते शिक्षा का स्तर इतना नहीं गिरता। ग्रामीण चाहकर भी आगे नहीं आ  पा रहे हैं। कुछ अध्यापकों को शिक्षण में कोई रुचि नहीं है। उन का एकमात्र उद्देश्य महीने के अंत में वेतन प्राप्त करना है उनके लिए किसी शायर की पंक्तियां मुझे उचित लगी कि ``तुमने चाहा ही नहीं वरना हालात बदल सकते थे तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह दरिया बनते तो दूर निकल सकते थे।''


By- : मुकेश जट 

Comments