कविता : तीसरी नस्ल।



   



आधी देंह क्यों मुझे बनाया
ना माँ, ना पिता , ना समाज ने अपनाया
कभी ना ममता मिली ! ना किसी ने गोद में झुलाया
जिसने पाया बस खून के आसूं रुलाया ।
एक बात बताऊ ? जब मै छोटी थी
मै पूरी रात सिसक-सिसक कर रोती थी
एक मैले से चादर में चेहरा छुपाए सोती थी ।
सच कहूँ ! तो दंश मात्र हैं जीवन मेरा
जिधर देखूं उधर अँधेरा
ना नर हूं ! ना नारी हूं !

मैं तो बस किस्मत की मारी हूं
मैं ना किसी की चाहत ना वास्ता हूं
ना तो मंज़िल हूं और नाही कोई रास्ता हूं ।
मैं ... मै समाज की वो बहिष्कृत तिरस्कृत सी त्रासदी हूं
भरी जो सिर्फ पीर से हैं मै वो जीवन नदी हूं ।
लोग कहते है हम लाली, बिंदिया और झुमके पहनकर
ढोलक पर नाचने वाले है
हम उनके जैसे नहीं ! क्योंकि हम तीसरी नस्ल वाले हैं ।

मैंने देखा है औरत पर ज़ुल्म हो या मर्द पर
यहाँ लाखों आवाज़ उठाने वाले हैं
लेकिन हमारे लिए तो कोई नहीं ? क्यूको हम...
हम तो तीसरी नस्ल वाले हैं।
हर सुबह आँखों में नए सपने लिए
धूप-छांव खेलती हूं मै
एक 'खुसरा' 'हिंजड़ा' 'किन्नर' होने का अभिशाप
हर दिन झेलती हूं मैं ।

चलो माना! सोशल मीडिया में ही/शी (he/she) की बात में खूब विरोध किया
लेकिन उसके बाद क्या ....
क्या सुना है किसी ने किन्नर बच्चा गोद लिया ?
शिकायत तुमसे या तुम्हारे समाज से नहीं मेरी
गिला तो बस खुदा से है कि
उसने मुझे आधी देह क्यों बनाया ? जिसे आज तक किसी ने ना अपनाया ।

साभार - प्रज्ञा मिश्र

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