कविता: खतरनाक है संवेदनाओं का हार जाना।



ख़तरनाक है शोर का खामोशी से मर जाना,
चीख का घुट के रह जाना,
ख़तरनाक है सीता के मान का अयोध्या में चोटिल हो जाना,
राम की प्रतीक्षा में लंका में बंदी रह जाना,
ख़तरनाक है निरापराध मूरत का मिट्टी में मिल जाना,
सीता का धरती में समा जाना,
खतरनाक है ज्ञानियों का मौन रह जाना,
माताओं का आगे न आना,
ख़तरनाक है किसी राम का कर्म का बंदी हो जाना,
निर्दोष किसी सीता को वन छोड़ आना,
ख़तरनाक है किसी सीता का अग्नि में उतर जाना,
 अपने अंतर की आग से अग्नि को न जलाना,
खतरनाक है फिर उसी इतिहास को दोहराना,
एक महाभारत को रचाना,
ख़तरनाक है संवेदनहीनता का सभा में नग्न चले आना,
संवेदनाओं का मौन रह जाना,
ख़तरनाक है कलम और मुकुट का कठपुतली बन जाना,
बिकने को बीच बाजार बैठ जाना,
खतरनाक है संस्कृतियों को अपमानित कर जाना,
मनुष्यता के ससंस्कार का मर जाना,
ख़तरनाक है सभा में आज भी द्रौपदी को निर्वस्त्र कर जाना,
सभा का मूक रह अपराधी हो जाना,
ख़तरनाक है एक कर्ण का मर्यादा भूल जाना,
नारी के मान को धूमिल कर जाना,
खतरनाक है किसी अग्निसुता को अग्नि बना जाना,
आवश्यक है कुन्ती-गान्धारी का सभा में रह जाना,

ख़तरनाक है किसी धृतराष्ट्र का गद्दी पर बैठ जाना,
गान्धारी की आँखों पर पट्टी बंध जाना,
ख़तरनाक है किसी कि कमी को हँसी में उड़ाना,
किसी को जान कर नीचा दिखाना,
खतरनाक है आज भी कर्ण का उपेक्षित रह जाना,
कुल की पहचान का सामर्थ्य से बड़ा हो जाना,
ख़तरनाक है समाज में गुरु का अपमानित हो जाना,
दक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा कट जाना,
खतरनाक है राजनीति का अंधा हो जाना,
देश का कुरुक्षेत्र में पहुँच जाना,
ख़तरनाक है स्वयं विनाश को निमंत्रण दे आना,
बालकों को समर का सार सिखाना,
खतरनाक है महत्वकांशा का सारथी हो जाना,
अपनों से पटी भू-तल को देख न पाना,
खतरनाक है बाहों के बल का हर जाना,
जीत के लिए छल कर जाना,
खतरनाक है ममता के हृदय को आहत कर जाना,
पांडव पुत्रों की भी बलि चढ़ जाना,
ख़तरनाक है स्त्री के अंतर की आग का धरा पर उतर आना,
आंगन में प्रतिशोध का वृक्ष लगना,
खतरनाक है अभिमन्यु को अधूरा ज्ञान दे जाना,
कोख में ही भविष्य का गढ़ दिया जाना,
खतरनाक है किसी दुर्योधन को पोषित करना,
अन्याय का ,अधिकार को शोषित कर जाना,
खतरनाक है एक भीष्म का अधिकार हर लिया जाना,
किसीशान्तनु का कमज़ोर पड़ जाना,
खतरनाक है गंगा में ज्वार न आना,
अधिकार के लिए न लड़ पाना,
खतरनाक है किसी अम्बा को अपमानित कर जाना,
किसी वस्तु की तरह जीत कर लाना,
खतरनाक है रीति-रिवाजों का आडम्बर में ढल जाना,
समय के साथ कदम मिलाकर न चल पाना,
खतरनाक है सभ्यताओं के पौधों में घृणा का फ़लना,
मनुष्य का भेद-भाव की मिट्टी में पलना,
खतरनाक है मनुष्य का मनुष्यता की चिता को सजाना,
अपराधी हो भविष्य को श्रापित कर जाना,
खतरनाक है मनुष्य से पहले मनुष्यता का मर जाना,
महाभारत के पात्रों को आज भी प्रासंगिक कर जाना,
खतरनाक है मनुष्यों के युद्ध में संवेदनाओं का हार जाना,

धर्म के संरक्षक पात्रों पर प्रश्न उठना,

खतरनाक है संवेदनाओं का हार जाना,
खतरनाक है संवेदनाओं का हार जाना।।


           -प्रिंसी मिश्रा

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