पैर छूने की होड़ में नेताजी।



परचा दाख़िल कर आये है चुन्नू नेताजी। उनके नामांकन में जबरदस्त भीड़ भी उमड़ी थी, हालांकि यही चेहरे अगले दिन रामसुलभ नेता जी के नामांकन में भी थे। अब बीस-तीस दिन बचे है वोट गिरने के।

सो सभी प्रत्याशियों ने अपने-अपने चुनावी रणनीति के अस्तबल के घोड़े छुट्टा छोड़ दिये है। एक महाशय तो 'चरणस्पर्श' को ही अपना अमोघ अस्त्र मानते है। पूरे साढ़े चार साल जनता को देखके बगलें झांकते है और चुनावी सरगर्मी के छः महीने में सबके चरणों की धूल फांकते है।

क्या राम क्या रहीम, सबके गोड़ लगना है इनका दीन। एक्टिवा से चच्चा उतर भी नहीं पाते है कि ये उनके गोड़ धर लेते है। चच्चा कहते है कि हमारे धर्म में ई सब नहीं अलाऊ है। तो चुन्नू बाबू उनको सर्वधर्म का पाठ पढ़ाते हुए कहते है कि ये हमारी संस्कृति और संस्कार का हिस्सा है, हम सब अपने से बड़ो का ऐसे ही आदर-सत्कार करते है। चच्चा मन में कहते है कि बाकी के साढ़े चार बरस चुन्नू अपनी संस्कृति को कौन से पिटारे में बंद कर देता है? जो पिटारा चुनावी बीन बजने पे ही खुलता है।

रामसुलभ मौके पे निर्वाचित पार्षद है तो वो अपनी सुविधा अनुरूप अपने वोटरों की ही बंदगी करते है। हाँ! वो न जाने कौन सा एक्स रे चश्मा रखे है जो उन्हें गुप्त दान मने मतदान भी दिख जाता है कि उन्हें किसने वोट दिया है और किसने नहीं दिया है। 

रामसुलभ जी घुटनास्पर्श करते है, पार्षदी की ठसक जो बनाये रखनी है। वही चुन्नू बाबू पैर के नाख़ून छूते है और बाकायदा बताते भी है कि असली चरणस्पर्श तो नाख़ून को छूना ही है, इससे डायरेक्ट तेज प्रवेशित होता है अन्तर्मन के भीतर। कभी-कभी तो चुन्नू बाबू दंडवत भी हो जाते है और चरण पे अपना सिर ही टिका देते है।



चुनाव प्रचार की आंखोदेखी
By - संकर्षण शुक्ला



Photo credit : FBD news 

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