कहानी: उसके जाने के दस साल बाद।





कई साल बाद पारुल का संदेश मिला.. कहां हो....अब आगरा में हूँ...खिलखलाई....कब तक रहने का इरादा है...कोई शहर छोड़ा भी है तुमने....पारुल पागलखाने में हूँ....सही जगह हो...अरे बेवकूफ मैं 26-27 को वहीं हूं, इसलिये पूछा.........आइए, बहुत दिन हो गए मिले हुए....ठीक है फोन कर दूंगी।

26 की शाम मिलने को बुलाया था,अपन 27 की दोपहर तय कर बोला, विदेशियों से मुक्ति पाओ तो फोन कर देना। एक बजे फोन आ गया कि फलाने होटल आ जाओ.....खाना खिलाओगी न..बहुत भूख लगी है...ज़रूर खिलाऊंगी, पर गाड़ी लेते आना। 


उतरा तो 10 साल पहले की पारुल और 10 साल बाद का मैं.......कैसे हो......कहां-कहां भटक लिये......पहले कुछ खिला दीजिये.....पांच दिन से खाना नहीं खाया.....ड्राइवर से गाड़ी मुड़वायी.....पारुल का कोई खासा जाना-पहचाना रेस्त्रां......बाहर चोबदार से लेकर अंदर बेयरे तक मुस्कुराते हुए सलाम ठोंक रहे......वो भी सबका हालचाल लेते हुए अपने मेहमानों के लिये डिनर की तैयारी का जायजा ले रही।

क्या मंगाना है...दाल-रोटी-सब्जी बस.....ठीक है.....आॅडर्र दे दिया....बात शुरू करने से पहले फेसबुक में लिखा ..टीवीआई का बन्दा.. का प्रिंट जेब से निकाला और देते हुए कहा....रात को पढ़ना। उसने पूछा भी कि विभाकर पर है न!


अगले डेढ़ घंटे तक हम बातचीत करते रहे, खाना खाते रहे.....लेकिन दोनों तरफ विभाकर ही था.....शतरंज के उस खेल की तरह, जिसे एक ही जना खेलता है और कभी आमने-कभी सामने या बोर्ड के बीचोबीच बैठ कर दोनों तरफ की चालें चलता है। विभाकर भी तो यही कर रहा था। टीवीआई के साढ़े तीन साल और पारुल के साथ बिताए न जाने कितने साल.....सब जगह वो ही था।

बस एक ही दिन बाद पटना से फोन आने शुरू हो गये कि विभाकर कहां है...फिर कुछ ही समय बाद फोन आया कि जल्दी आओ...वो कोमा में है। फ्लाइट से पटना और वहां से दरभंगा अस्पताल पहुंची। सारे वार्ड निकल गये, पर वो कहीं नहीं दिख रहा था.....कहीं कोने में लेटा था.....भीड़ देख कर मैं सब समझ गयी......एई, तुम खाना खत्म करो...मैं बिल्कुल नहीं रोऊंगी....पर अपनी आंखों में धुंधलापन आना शुरू हो गया था...चलो चलें.......जब कार में बैठने लगा...तो उसके सिर पर हाथ चला गया.....अरे तुम मुझसे छोटे हो......क्या फर्क पड़ता है पारुल......बोली, बस ऐसे ही रहना तुम.....तुम ही हो जो मुझमें विभाकर को तलाशते हो....उसके जाने के बाद तो उसके सब यार-दोस्त मुझमें औरत को ही तलाशते रहे।

घर पहुंच कर सीढ़ियों पर कदम रखा ही था कि फोन बजा.....राजीव, तुम्हारे जाते ही वो मैंने पढ़ा.....तुम फिर विभाकर को मेरे पास छोड़ गये....मैंने कहा था न मैं नहीं रोऊंगी.....मैं क्या करूं.....मैं रो रही हूं......कई देर से पता नहीं कहां अटके आंसू अब और इंतजार नहीं कर सकते थे.....कमरे का ताला खोलते-खोलते बाहर आने शुरू हो गये।


By - राजीव मित्तल

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