कौन है कातिल ? किसने हत्या की है ? सब निष्प्राण,दिखाई देते हैं।






कौन है कातिल ? किसने हत्या की है ?
सब निष्प्राण,दिखाई देते हैं।

फिर,

लाश खड़ी,मुर्दों से क्या पूछ रही है?
सत्तर साल हुए आज़ादी को,
बँधी बेड़ियों में अब क्यों आज़ादी चीख रही है?
कड़वा सच, कानों को खूब चुभेगा,
पढ़ कर सबके दिलों से रक्त बहेगा,
रूह समेट लो अपनी अब सब,
अक्षर-अक्षर एक 'वैश्यालय' की काली पीर कहेगा,
इस पिंजरे के बंदी की पथराई आँखों में,
गौर से देखो तो, कितने भेड़ियों का अक्स दिखेगा।
चौंक गए कितने पढ़कर ये?
मानो मैंने गाली दी हो।
असभ्य नहीं कुछ भी कहती हूँ,
जो सच ,पर कड़वा है,उसे कागज़ पर रखती हूँ।
तथाकथित सभ्य समाज में भद्दी गाली हैं जो,
पहचान कराओ उनकी भी, इन गलियों में इनको लाया जो,
मालूम नहीं हो तुमको तो बतला दूँ,
अपने कदम चलकर नहीं है ज्यादातर आतीं,
न फूटी किस्मत है इन रस्तों पर इनको चलाती,
किसी अपने,
या जाने पहचाने चेहरे से ज्यादातर हैं धोखा खातीं,
मण्डी लगती है,फिर परख है होती,
जी हाँ सही सुना ,फिर परख है होती,
और फिर सरे आम इनकी इज़्ज़त बाज़ारू होती,
ऊँचे-ऊँचे भाव से लेकर फुटकर तक बोली लगती है,
और फिर अपनी ही काया इनको ठगती है,
कितनी तो अपनों के ही हाथों बिकती हैं।
अब संयम बाँधों,
कलम इससे भी कुछ कड़वा कहने वाली है,
एक तिहाई से ऊपर इस काले बाजार में, बच्चे बिक जाते हैं,
ऐसे लोगों का हृदय क्या भावों से खाली है?
लिख कर भी ये चुभती सच्चाई  हर लव्ज़ सवाली ,
फेरो नहीं नज़र ये, और गौर से देखो अपने बच्चों को,
सोचो क्या कर गुज़रोगे, नज़र कोई जो इनपर डाले काली,
इसी उम्र के हैं ज्यादातर ,बच्चे बाज़ारों में इन बिकने लाये जाते।
नहीं कोई है खैरख्वाह,न कोई ज़ख्मों पर मरहम रखने वाले,
हर दर मिल जाएँगे ढोंगी ,बच्चों को भी ठगने वाले।
पहले जाल बिछाया जाता है,फिर शिकार फँसाया जाता है,
हर नुक्कड़ पर सौदा करने को,एक दलाल बिठाया जाता है,
फिर एक-एक करके सारा बाजार दिखाया जाता है,
ठेकेदारी करते हैं जो इन मोहल्लों की,
उनका डर बगावत के हृदय बिठाया जाता है।
बंगाल,बिहार,असम,आंध्र और यू.पी की खेती से,
इनको इस मंडी में खास मँगाया जाता है।
इतना नहीं बस,
इस काले बाजार को ,जमाने की खातिर,
शादी जैसे पावन रिश्ते का भी बाज़ार लगाया जाता है,
दाम जहाँ लड़के का घर देता है,
और इतने पर भी लड़की के घर को संकोच न होता है,
कितनी बार सुना कि,लड़का दहेज दे के आया है?
सच ये है कि,
मुनाफ़ा कमाने की खातिर,कच्चा दाम चुकाया है।
कल को बेच किसी बाज़ार उसे वो आएगा,
और फिर नया शिकार फँसाएगा।
बेहतर ज़िन्दगी के सपने कितने दिखलाये,

फिर किसी 'सितारा,लक्ष्मी,माया' को बिकने को ले आये।
दबोच कहीं किसी गली कूंचे से,अनजान राह पर पहुँचाया,
और फिर भटकने का इल्जाम,उसी के सर आया,
बहिष्कृत इस समाज से,यही निर्दोष रही,
जिन्होंने दलदल से बाहर निकलने दिया नहीं,हैं असल दोषी वही।
कौंन है कातिल,किसने हत्या की,
लाश खड़ी,मुर्दों से क्या पूँछ रही?
अपने दामन को पाक साफ बताते हो,
सभ्य समाज के वासी कहलाते हो,
फिर क्यों इन काली गलियों में जाते हो?
तुम न जाओ तो बाज़ार लगेंगे क्यों?
किसी नन्हीं बच्ची के,खाब बिकेंगे क्यों?
किसी औरत के अरमान बिकेंगे क्यों?
इतना कह कर भी,एक अहम बात तो रह ही गयी,
अब अच्छी-बुरी तय खुद कर लेना,
एक बार इन गलियों में गूँजे किलकारी तो,
एक नज़र उधर भी कर लेना,
और एक और मृत्यु के शोक में आँखें नम कर लेना।
फूल यहाँ भी खिलता है,
हालांकि,
जन्म के साथ ही,जीवन का अभिशाप भी मिलता है।
जीवन अभिशाप भी मिलता है।
कौन है कातिल,किसने हत्या की है,
सब निष्प्राण ,दिखाई देते हैं,
लाश खड़ी मुर्दों से क्या पूछ रही है।

           -प्रिंसी मिश्रा

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