जी हाँ जनाब, मैं इश्क़ लिखता हूँ मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ।







जी हाँ जनाब, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ
मैं वफ़ा-बेवफा, हर तरह का इश्क़ लिखता हूँ
जी हाँ, मैं इश्क़ के सफर की हर खबर लिखता हूँ

मैं किसी की वफ़ाओं का सरोबार,
उन वफ़ाओं का छाया वो खुमार लिखता हूँ
मैं वतन प्रेमियों के दिल में,
घर बैठी उस तन्हा बीवी का हाल लिखता हूँ
मैं महीनों बाद घर लौटे उस सिपाही की,
वो प्रेमी के साथ बिताई रात की हर बात लिखता हूँ
मैं उन हो गई बेवाओं को भी,
उनकी इबादत के लिए सलाम लिखता हूँ
ज्यादा कुछ नहीं, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ

मैं दोस्ती से प्यार तक का सफ़र,
इस सफ़र में घटी हर खबर लिखता हूँ
मैं प्यार का वो पहला इज़हार,
और उस इज़हार का स्वीकार लिखता हूँ
नहीं-नहीं कभी-कभी मैं इनकार भी लिखता हूँ
मैं सुबह से लेकर शाम तक का,
किया किसी का वो इंतजार लिखता हूँ
मैं उसके मिलने नही आने की,
की वो बहानेबाजी,वो नखरेबाजी लिखता हूँ
जी हाँ हुजूर, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ

मैं अजनबियों से मुलाकात का,
वो पहले मिलन का वक़्त लिखता हूँ
हाँ हुजूर मैं पहली मुलाकात का,
वो मुँह से निकला हर लफ्ज़ लिखता हूँ
हाँ मैं साथी के प्रेम की भूख,
उसके लबो की वो प्यास लिखता हूँ
मैं नहीं आती रात को नींद,
तो उसकी भी एक वज़ह लिखता हूँ
जी हाँ जनाब, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ

मैं बचपन साथ बिताई,
उस महबूब की वो याद लिखता हूँ
जीवन साथ बिताने की,
कभी खाई थी वो हर कसम लिखता हूँ
मैं खुदा से प्यार मिल जाने की,
हुजूर मैं की गई वो हर इबादत लिखता हूँ
मैं दोस्तों द्वारा प्यार के लिए,
हमारे लिए की गई वो दुआ भी लिखता हूँ
अरे मेरे यार, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ

मैं उसकी शादी की बात,
सुनकर ही बहाये वो अश्क़ लिखता हूँ
मैं उस पल की ख़ामोशी में भी,
उन बेजुबान दिलों से आई वो आवाज लिखता हूँ
मैं शादी के बाद भी जनाब,
वो मुलाकात का पहर लिखता हूँ
हाँ मैं उस पहर में घटी हर ख़बर लिखता हूँ
मैं दोनों दिलो में छुपा जो,
जीवन साथ नहीं बिता पाने का दर्द लिखता हूँ
जी हाँ जनाब, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ

मैं बेवफाओं के ढाए,
हर सितम का आसार लिखता हूँ
मैं कभी तन्हाई में यारों,
गुनगुनाये वो दर्द-ए-गीत लिखता हूँ
मैं भीगे सावन में भी यारों,
बरसात में साथ भीगें वो एहसास लिखता हूँ
मैं दोस्ती से मिलें प्यार,
प्यार से शादी तक का सफर लिखता हूँ
ज्यादा कुछ नही जनाब,
मैं बस इश्क़ के समंदर की एक बूँद लिखता हूँ

मैं कभी तन्हा अकेले,
वो तन्हाई के छिपे राज़ लिखता हूँ
मैं कभी भरी महफ़िल में भी,
गूँजी उस शायर की आवाज लिखता हूँ
मैं कुछ नया नहीं हुजूर,
वहीं सदियों पुराना, घिसा-पीटा इश्क़ लिखता हूँ

जी हाँ जनाब, मैं इश्क़ लिखता हूँ
मैं बचपन से बुढ़ापे तक का इश्क़ लिखता हूँ
मैं नादानियों से जिम्मेदारियों तक का इश्क़ लिखता हूँ
मैं वफ़ा-बेवफा, हर तरह का इश्क़ लिखता हूँ
जी हाँ, मैं इश्क़ के सफर की हर खबर लिखता हूँ


By- Hitesh Kumawat

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