कहां गिरा होगा मेरा झुमका ?



उस दिन मुझे निहायत याद नहीं रहा कि, तुम्हारा झुमका मेरी जेब में ही रह गया. यह हो सकता है कि तुम्हे उठाने के दौरान तुम्हारा सिर मेरी छाती से टीका होगा. शर्ट के जेब में लगी कलम में उलझकर तुम्हारे एक कान का झुमका, मेरी बगुले की पांख जैसी सफेद झक्क शर्ट की जेब में आ गिरा. मैं भी क्या करता..

तुम अपनी सहेली के साथ आटो में चली गई. पीछे-पीछे तुम्हारी स्कूटी लिए मैं आ रहा था. मैं आॅटो के आगे भी चल सकता था पर, मुझे तो पता ही नहीं था की आॅटो वाला सज्जन आपको कहां ले जा रहे हैं. यहां थोडे ही दूर तीन बडे अस्पताल हैं. सो मैं आटो के पीछे चलने में भलाई समझा. अस्पतालपहुंचते ही पर्ची, दवाई और डाक्टर की ताम-झाम के बीच मुझे लगा की कुछ सीने में चुभ रहा है. फिर मुझे लग कि कलम है. कहीं दब गई होगी. वैसे भी मेडिकल स्टोर पर बहुत भीड़ थी.

 बेड पर तुम्हारे हाथ में सुफेद पट्टियों को देखकर, सोचने लगा की एक्सीडेंट खूबसूरत भी होता है. पट्टी के बेतरतीब धागे को सुलझाने में तुम उलझी हुई थी. तभी मेरी नजर तुम्हारे बिना झुमके वाले कान पर जा कर ठहर गई. मन में सोचा, इसका झुमका तो गया काम से. इसकी जान बच गई ये क्या कम है. 

खैर, समाज कार्य करने के बाद धन्यवाद और मिलने का वादा हुआ. पर किसी को ख्याल भी नहीं रहा की, आखिर हम लोग मैं, घायल लड़की और उसकी सहेली मिलेंगे कैसे. एक-दूसरे का नाम और पता तो साझा किए ही नहीं . अफरा-तफरी और दवा-डाक्टर में जैसे स्मृति का ही लोप हो गया था.

आफिस आने के बाद काम में ऐसे जुटा की एडिशन छूटने के बाद से सीधे रात के दस बज गए थे. मेरी देह अकड़ रही थी, मैं अंगड़ाई लेते हुए कंटीन की तरफ बढ़ा जा रहा था. खाने खाने के दौरान बरबस ही जेब पर हाथ चला गया. 

उंगलियों के स्पर्श से, मन में आया कि ये गुम्बदनुमा डिब्बी जैसी क्या बला है. निकालकर देखते ही, मुंह से निकल पड़ा ...ओह्ह ! ये तो झुमका है.
मुझे समझते देर नहीं लगी कि...नीला, लाल, आसमानी, कत्थई और सुफेद रंगों का मेहराबदार झुमका उसी लड़की का है. जिसकी स्कूटी ट्रैफिक सिग्नल पर फिसल गई थी. इस हादसे में लड़की को मामूली से चोट आई और उसकी कलाइयां, सड़कों की बजरी से घिसकर छील गई थी.

अस्पताल से बाहर आने के बाद ऐसा लग रहा था. जैसे किसी जमाने में मैं जौहरी या सुनार था. झुमके की सारी लड़ियां गिन डाली, रंगों को बहुत ही करीब से पहचान लिया. मोतियों की जड़ी, नक्काशी और उंगलियों के स्पर्श से जेहन में उसके विस्तार और बुनाहट को उतार लिया. 

इन सबके बाद मेरे दिमाग में एक विचार आया, झुमका इतना खूबसूरत, शांत और चांद की चौसठ कलाओं से भी ज्यादा रहस्यमयी कैसे हो सकता है. आखिर इसे किस संकल्पना या तर्क के आधार पर झुमके का इजाद किया गया होगा. झुमके की खोज करने वाला शिल्पकार कितना स्पष्ट और बहुआयामी सोच वाला रहा होगा. जो धातु के आभूषण और प्रकृति के सौन्दर्य को बखूबी ढ़ाला, जिसकी जितनी तारीफ की जाय कम होगा.

अगर कभी वो लड़की अपने खोये हुए एक कान के झुमके के बारे में सोचती होगी...तो क्या सोचती होगी..?

कहां गिरा होगा मेरा झुमका..?
एक लड़के की शर्ट की जेब में !





By - पवन मौर्या

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