ख्वाहिशों के शहर में।

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तुम्हारी बालकनी पे शाम कोई सूरज डूबे
मेरी रातों को भी कौन सा करार आता है,
तुम्हारी एहसास भर से झूम उठती है सासें
जैसे किसी गरीब का लॉटरी निकल आता है...

 जामुनी रंग के ऊन से बने स्वेटर में तुम्हारा प्रेम महसूस कर रहा हूँ  कितने अरमानों से होठों पे मुस्कान लिए पहले ऊन का गोला तैयार की होगी, फिर दो कांटें(स्लाईड) के बीच  फँसा के स्वेटर का घर तैयार की होगी तुमने फिर..

कोई एक घर भूल जाती होगी तो उफ़्फ़ फिर उतने घरों को उधेड़कर ठीक करती होगी तुम, फिर मन मे एक गीत गुनगुनाती होगी ..मैं महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी उंगुलियों का वो प्रेम जो स्वेटर के इस घर मे रचा बसा है, 

सांझ की पीठ पर जब आकाश का रंग सिंदूरी होता है
तब तुम्हारी याद आती है और फिर दिल मे उथल पुथल होती है बेतरतीब, बेहिसाब बेपरवाह और बेवजह, ..क्या ऐसा तुम्हें भी होता है

सुनो ना.. भोर किटकिटाती बीतती है, जैसे हमारा बदन जमा ग्लेशियर होता है, जिसे कोई बाहें भिंच कर ही पिघला सकता है ! 

एक बात और, तुम्हारी आँखों के कहे वो बोल तुम्हारी आवाज से पहले ही मेरी आँख के कोर तक पहुँचकर ठहर जाती है और तब तुम्हारी वो बात याद आती है,
प्रेम का एक पल छिपा लेता है अपने पीछे दर्द के कई बरस, और प्रेम के तीन मुकाम इंतजार, इजहार और इबादत से जिंदगी गुजरने लगती है...!



By - आकाश कुशवाहा (पेशे से इंजीनियर पर कलम से शब्दों को बुनने में इतने माहिर हैं कि कोई भी इन्हें इंजीनियर नहीं कहेगा। भारत में कम रहते हैं पर इनका दिल हिंदुस्तानी हैं।)

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