कविता : माँ।







माँ आज फिर तेरी याद आ गयी।
आज दिल फिर तेरे लिए रो उठा।।

याद है माँ जब तूने मुझे चलना सिखाया था।
मैं तो गिर ही पड़ी थी अपने कदमो से लड़कर।
फिर तूने मेरी उंगलिया पकड़ कर मुझे आगे बढ़ना सिखाया।
पढ़ना लिखना। बोलना सिखाया।।

और जैसे ही मैं बड़ी हो गयी तूने मुझे खुद से दूर कर दिया।
शायद मेरे सुनहरे भविष्य के वास्ते।।

पर क्या तुझे मेरी याद नहीं आती?
तेरा मन नहीं करता मुझसे मिलने को?

माँ तेरे बिना यहाँ अच्छा नहीं लगता।
सब सब सूना सूना लगता है।।

जी करता है सब छोड़ कर आ जाऊँ तेरे पास।

फिर तेरे और बाबा के सपने याद आ जाते हैं और ये कदम वहीं ठहर जाते हैं।।

माँ पता है रोज़ रातों को तेरी थपकी याद आती है जो तू मुझे सुलाने के वक़्त दिया करती है।।

माँ आज दिल कर रहा है तेरे गोद मे सिर रख कर सो जाऊँ और तेरे वो कोमल हाथ मेरे माथे को सहला दे।।

पर इस भीड़ मे इतनी दूर आ गयी हूं शायद मैं।
की वापिस तेरे पास लौट के जाने में भी समय लग जाये।।

पर माँ मेरा वादा है तुझसे तेरे आँखों मे कभी मेरी वजह से आंसू आये न तो वो ख़ुशी के होंगे माँ।
वो ख़ुशी के होंगे।।
           
By - अनुप्रिया 

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