आदमी और पशुता - बात महाभारत की है।





आदमी होना बड़ी बुरी बात है. पशुता से मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है. वह पशुता , जो आदमी के भीतर पैदा होती है , वह प्राक्रतिक पशुता से भी ज्यादा खतरनाक होती है. इसलिए आदमी का आदमी से सामना होना मुश्किल बात नहीं है , पशुता से मुकाबला करना खुद के आदमी को भी परेशान करने वाली बात है .

महाभारत में कर्ण ने किसी तरह से अपने भीतर के आदमी को बचाए रखा. अश्वसेन ने कर्ण के आगे पार्थ को मारने का प्रस्ताव रखा था. करना तो इतना ही था , कि सूतपुत्र उसे तीर के सहारे पार्थ तक पहुंचा जाते. पर कर्ण , कर्ण था , उसे इतिहास की परवाह थी . याद किया जाना चाहिए. कर्ण से अश्वसेन के इस प्रस्ताव पर क्या जवाब दिया था - दिनकर के शब्दों में - .
"उसपर भी साँपों से मिलकर मैं मनुज, मनुज से युद्ध करूँ?

जीवन-भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुद्ध करूँ?

तेरी सहायता से जय तो, मैं अनायास पा जाऊँगा,

आनेवाली मानवता को, लेकिन क्या मुख दिखलाऊँगा?"

"संसार कहेगा, जीवन का, सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया,

प्रतिभट के वध के लिए, सर्प का पापी ने साहाय्य लिया।

रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी,

सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुरग्राम-घरों में भी।"


"ये नर-भुजंग मानवता का, पथ कठिन बहुत कर देते हैं,

प्रतिबल के वध के लिए नीच, साहाय्य सर्प का लेते हैं।

ऐसा न हो कि इन साँपों में, मेरा भी उज्ज्वल नाम चढ़े,

पाकर मेरा आदर्श और कुछ, नरता का यह पाप बढ़े।"


"अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है,

संघर्ष, सनातन नहीं, शत्रुता, इस जीवन-भर ही तो है।"


इसलिए ऐसी पशुता से दूर रहना अच्छा है , जो आपकी आदिमियत को स्खलित करती रहे .आप भी ऐसे पशुओं से दूर रहें . मैं भी बचने की कोशिश में हूँ , ताकि आदमी बने रहने पर यकीन बनाये रखा जा सके.


By - आशुतोष तिवारी

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