रंगीला राजस्थान : नौ





बीकानेर के एक शिक्षामंदिर में हमारे साहित्य उत्सव का कार्यक्रम आयोजित था। सभागार छोटा था, गर्मी बहुत थी लेकिन मान-सम्मान था. सह-साहित्यकारों ने लघु कथाएँ पढ़ीं, कुछ उपयोगी-अनुपयोगी भाषण हुए.

रात को साढ़े ग्यारह बजे हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ राजस्थानी शैली की सजावट थी, भोजन-गीत-संगीत-नृत्य का संक्षिप्त आयोजन था. वहां बीकानेर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री बुलाकी शर्मा, श्री नवनीत पाण्डेय, श्री राजाराम स्वर्णकार से मेरी आत्मीय चर्चा हुई.

रात एक बजे हम अपने होटल पहुंचे. भव्य भवन और सुसज्जित रिसेप्शन को देखकर मन मुदित हो गया. आधे घंटे की मशक्कत के बाद कमरे की चाबी मिली. कमरे में मेरे सहवासी श्री सुनील जाधव और मैंने सामान रखा, स्नानागार का उपयोग किया और जैसे ही मैं बिस्तर में बैठा, हमारा पलंग धसक कर धराशायी हो गया. अचानक उत्पन्न उस स्थिति से मैं सहम सा गया, सुनील चौंक गए. मैं धीरे से बाहर निकला और रिशेप्शन में खबर की.



रात को दो बजे थे, हम दोनों गपियाते हुए पलंग सुधरने का इंतज़ार कर रहे थे. बहुत देर बाद दो वेटर साज-ओ-सामान के साथ आये और उन्होंने पूरा पलंग खोला, उसे ठोंक-ठाककर बनाया, फिर से बिछाया. वेटर ने बताया, 'सर, पलंग कमजोर बने हैं. कई कमरों में ऐसा हो चुका है.' कहावत याद आई, 'ऊंची दूकान, फीके पकवान.'

मुझे सुबह पांच बजे उठना था और दैनिक क्रिया के पश्चात मुझे योग-प्राणायाम में डेढ़ घंटे और लग जाते हैं. नास्ता के लिए निर्धारित समय सात बजे तक नीचे पहुँचना आवश्यक था क्योंकि हमें मरुभूमि के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए वहां से जल्दी निकलना था और रेगिस्तान में बसे गाँव सम जाना था.

सम नामक स्थान पर तम्बुओं की कई श्रृंखला हैं, आवास गृह बने हैं. हम जहाँ रुके, उसका नाम था, 'कैम्प-ए-खास'. उस सूखे रेगिस्तान में आवास की सुनियोजित व्यवस्था करने वालों को सलाम करने का दिल होता है. जहां पानी की बूँद-बूँद के लिए संघर्ष है, वहां भरपूर पानी, आरामदेह बिस्तर, उपयोगी टायलेट, पंखा आदि समस्त सुविधाएं उपलब्ध थी.

शाम को पांच बजे हम लोग अपने दुस्साहसी ड्राइवर की जीप में बैठकर रेत के टीलों की ओर निकल पड़े. उन टीलों पर जीप का चढ़ना और उतरना रोमांचक अनुभव देता है. एक जगह गाड़ी रुकी. वहां सवारी करने के लिए ऊंट थे, राजस्थानी भाषा में लोकगीत गाती नर्तकियां थी और रेगिस्तानी क्षितिज पर सूर्यास्त का मनोरम दृश्य. धीरे-धीरे सूर्य रेतीली धरती में विलीन सा हो गया और धुंधलका छाने लगा. हम कैम्प में वापस आये जहाँ कैम्प के मध्य में बने मंच पर साजिंदों के साथ गायक लोकगीत सुना रहे थे और बालाएं नृत्य कर रही थी. दिन और शाम के मनभावन अनुभव के बाद रात घिर आई, हम उस रात तबीयत से सोये क्योंकि सुबह जल्दी उठने का आसन्न संकट नहीं था. (क्रमशः)


लेखक : द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

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