एक ट्रेन थी, एक टाइम था और शहर जाने से पहले उसे देखने की तमन्ना थी।







वो,  पलकों को चूमते हुए कोई पागल सा ख्याल आया था. लगा था, ज़िन्दगी अब इन्ही आंखों की इबादत में गुजरेगी. हमने उसके बदन की हर अदा की कसम खायी थी, कि अब मैं इस चमन में बहार बन कर छा जाऊंगा. 

कि ज़िन्दगी कम है. मुश्किल है. दगाबाज है. 

उसे मेरी इबादत का खुदा रास नही आया. वह उन्ही पलकों को भिंगा बैठी, जिन्हें चूम कर ये जहन कभी पागल हो जाया करता था. मैंने खुदा से खुदा की शिकायत नही की. कि मेरा ख़ुदा मुझे समझदार लगता है.

एक ट्रेन थी, एक टाइम था और शहर जाने से पहले उसे देखने की  तमन्ना थी, वह नही आई, ट्रेन आ गयी.

समय पर अब यकीन नही रहा. इसलिए अब रुकी हुई घड़ियां पहनता हूँ. इस बार जब घर गया था, तो अम्मा ने कहा था कि निम्मी की सगाई होने वाली है.

चार दिन इंतजार किया. लगा, वफ़ा का इंतकाल हो गया. पांचवे दिन जब जाने लगा, तो चुपके से अम्मा के कान में कह दिया- 

कि 'निम्मी आये तो कह देना, कि आशु आया था'



लेखक - आशुतोष तिवारी

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