रंगीला राजस्थान : तेरह : समापन किश्त : -------------






मैं जोधपुर गया लेकिन घूम नहीं सका क्योंकि मैंने इस यात्रा को कुछ कारणों से अधूरा छोड़ने का निर्णय लिया. इसी वज़ह से माउंट आबू और उदयपुर भी छूट गया जबकि ये दोनों स्थान मेरे देखे हुए नहीं थे, बाकी सब देखा हुआ था. मैं इन्हीं दोनों जगहों को देखने की दिली ख्वाहिश के साथ इस यात्रा में खास तौर से सम्मिलित हुआ था, लेकिन संभव न हुआ. कभी फिर मौका मिलेगा तो इन स्थलों के अनुभव भी सामने आएँगे. 

प्रबंधन में एक अवधारणा है कि वह हर व्यक्ति जिनके मध्य कोई व्यवहार हो रहा हो, वह 'कस्टमर' है. यद्यपि 'कस्टमर' शब्द व्यापार के संदर्भ में अधिक उपयोग में लाया जाता है और आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि ग्राहक वह है जो प्रदत्त वस्तु या सेवा का भुगतान करे. 

प्रबंधन की आधुनिक व्याख्या के अनुसार, हर-एक व्यक्ति ग्राहक है. जैसे मालिक और अधीनस्थ, साहब और बाबू, अधिकारी और नागरिक, चिकित्सक और रोगी, विक्रेता और क्रेता, शिक्षक और छात्र, साहित्यकार और प्रकाशक, लेखक और पाठक आदि सब 'एक-दूसरे' के 'कस्टमर' हैं, उनके बीच आर्थिक लेन-देन चाहे हुआ हो या न हुआ हो. 

जब मैं जोधपुर से बिलासपुर वापस लौट रहा था, प्रबंधन का यह सूत्र मेरे मस्तिष्क में बहुत देर तक घूमता रहा. मैं खुद से प्रश्न कर रहा था कि इस साहित्यिक यात्रा में क्या मैं भुगतान करने के बाद भी 'कस्टमर' की इस परिभाषा के बाहर था ? (समाप्त)


लेखक - द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

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