मुंबई लोकल में सफर करने वालो के नाम एक कविता।




एक नीरस वादा रोज निभाता हूँ।
मैं खुद से ही अपनी इच्छा छिपता हूँ।

उम्मीदों के आलीशान मकानों को
रोज बनाता हूँ पर जिम्मेदारियों की आड़ में  लोकल चढ़  उसे ढहता हूँ।

भीड़ चाहे कितनी भी हो
मैं जिम्मेदारी की चादर ओढ़ चढ़ जाता हूँ।

उसकी मर्जी है वो वक्त से ज्यादा नहीँ रुकती
मेरी भी जिद है मैं वक्त से पहले उसका इंतज़ार करता हूँ।

एक नीरस वादा रोज निभाता हूँ।
मैं खुद से ही अपनी इच्छा छिपता हूँ।

By - सूरज मौर्या

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