कहानी: एक नई भोर।



दिसम्बर की हाड़ कँपाती ठंड,सुनसान रात में भौकतें कुत्तों की आवाजों के बीच दहलता मासूम दिल और उस पर भी उसका पीछा करते निर्मम  चार जोड़ी पाँवों से छुपने के लिए आठ वर्षीय सहमे मंगलू के कदम और तेज़ी से बढ़ने लगे।भय से अब तो आँसू भी सूख गए थे।तभी गली के कोने पर एक अंधेरी कोठरी जिसका दरवाज़ा हवा से चरमराता हुआ खुल गया,चुपके से वो उसमें घुस गया।
'ढूंढों, चारो ओर,अरे! उधर से आवाज़ आयी। चलो उधर,।'

 बोलते हुए बच्चों का अपहरण कर,उन्हें विकलांग बना भीख मँगवाने वाले राजा डॉन के गुर्गे आगे निकल गए।
'उफ्फ...जान बची।'कहकर राहत की सांस लीे।
कोठरी को नज़र घुमा कर देखा फटी पुरानी दरी,कुछ लकड़ियां,टूटे बर्तन और खस्ता हाल खटिया के सिवाय और कुछ न था वहाँ।खाने को बहुत ढूंढा पर कुछ न मिला तो भूखे पेट ही फटी दरी ओढ़ सो गया।
 कुछ घण्टों बाद भीखू अपनी कोठरी पर बड़बड़ाता हुआ लौटा।

'साला! दारू का जुगाड़ हुए महीना हो आया।और आज तो भीख भी दिन भर में बस इतनी सी ही मिली कि उससे रोटी भी ला पाया।पर चलो इतना शुक्र है कम से कम भूखे पेट तो न सोना पड़ेगा आज।कहकर रोटी के पैकेट को चूम लिया उसने।

फिर दरवाज़े पर लात मार कर खोल तो नींद से अचानक जागा मंगलू,डर के मारे दीवार से चिपक कर घुटनों के बल बैठ गया और थर थर कांपने लगा।

'रे कौन है रे तू?'
'मंगलू।''कहाँ से आया?
'गोरे गांव से।''घर में कौन कौन है?'
'बाबा है बस,जो रोज़ दारू पीता है।'
'पर यहाँ मुम्बई में कैसे आया तू?'

'मैं ही चाय के होटल पर बर्तन माँज कर बाबा को दारू के पैसे देता था।एक दिन उसने मुझे एक गंदे सेठ को बेच दिया।वो रोज़ दिन में मुझसे घर का  सारा काम करवाता,खूब मारता पीटता  और रात को ...............कहकर वो सकुचा कर रुक गया फिर सहम कर बोला,'मैं वहां और रहता तो मर जाता।भाग आया मैं।फिर रास्ते से मुझे कुछ लोगों ने उठा लिया और यहां ले आये और मेरा हाथ काट दिया और फिर अस्पताल भी ले गए वहाँ ठीक भी करवाया जिससे मुझसे भीख मँगवा सकें।रोज़ मारते थे मुझे वो।उनसे बच कर बड़ी मुश्किल से निकल कर भागा हूँ।अभी मुझे बचा लो उनसे,बस आज रात यहीं रहने दो अंकल कल सुबह चला जाऊंगा मैं।पैरों से लिपट कर रोने लगा उसके वो।
'गोल गेंहुआ मासूम सा चेहरा,रोने से सूजी हुई लाल आंखें।'

जिन्हें देख पहली बार विचलित हुआ वो।नहीं तो कौनसे खराब काम बचे हैं जो उसने नहीं किये।चोरी से लेकर,झूँठ बोलना,धोखाधड़ी,जुआ, शराब से लेकर कोठे तक। 

पर अब जैसे मन में कुछ पिघल कर आंखों से बहने को आतुर है।भरी आंखों से एकटक बड़े स्नेह से देखता रहा वो उसे फिर बोला।

'चल बाबरे, कैसे रोता है?मुझे भी रुलाएगा क्या?कहीं नहीं जाएगा तू।कह कर सीने से लगा लिया उसे।

फिर कुछ रुककर बोला।

कुछ खाया?''नहीं।'

'ले रोटी लाया हूँ खा ले,दो हैं पूरी।'चहक कर बोला वो।खुद की भूख तो उसे रोटी खाते देख जैसे हवा ही हो गयी।भरी आंखें पर चेहरे पर संतुष्टि और मुस्कुराहट लिए वो उठा और अपनी बरसों पुरानी बूट पोलिश की पेटी पर जमीं गर्द झाड़ने लगा। 

By - ज्योति शर्मा 


फ़ोटो क्रेडिट : .cepolina.com

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