कविता: ज़िंदा हिंदुस्तान रहा।





कल का बीता लम्हा कुछ खास रहा ,

जो गुज़र गया, एक कड़वा एहसास रहा,

चलती लाशों का, मौन यहाँ शमशान रहा,

तर्पण को घाट गए तो,गंगा का पानी लाल रहा,

इस पर भी,

हाथों में जो घट था उसमे, जिंदा हिंदुस्तान रहा,

जितना भी था,जीवन भर वर्दी का अभिमान रहा,

 सीमा के यज्ञ में आहूति बन, अर्पित निज प्राण रहा,

सब तीरथ देख लिए पर,सरहद सा न कोई भी धाम रहा,

सरहद के आँसू के बल से,केसरिया गंगा तट का परिधान रहा,

इतनी कुर्बानी से धुल-धुल कर उजला भारत का मान रहा,

जिसमें छलकता ,नीले अम्बर का शीतल अभिमान रहा,

शुशोभित हर ओर धारा पर,धानी धरती का भाल रहा,

लहराता निज मान संभारे,तिरंगा मेरा-तेरा महान रहा,

फिर भी चलती लाशों का मौन यहाँ शमशान रहा,

तर्पण को घाट गए तो गंगा का पानी लाल रहा,

उजले पर्वत पर दिखता लहू,भारत के माथे पर कुमकुम बन पहचान रहा,

मिट्टी हो जाने वाला,अजर-अमर शहीद हर जवान रहा,

हाथों में जो घट था उसमें ज़िंदा हिंदुस्तान रहा,

जलते अंगारों में पलता,हर आँख में चमकता,हृदय का भाव ये गतिमान रहा,

अर्थी के चरणों को चूम,छलकता धरती का हर एहसास रहा,

पीछे चलते पिता के चरणों से,चंदन हो जाने का मिट्टी को अभिमान रहा,

हर गिरते जवान के बल से,शर्मिंदा सियासत का खोखला अभिमान रहा,

कौन है जो धरती-अम्बर के क्रंदन से अनजान रहा,

नन्हें बालक की आँखों से गिरता निश्चल आँसू,पीड़ा की पहचान रहा,

आँखों में चढ़ कर, ज़ुबाँ तक आता, यूनिट का अभिमान रहा,

घायल माँ के छलनी आँचल को,बेटे का इंतज़ार रहा,

धूमिल और ढका धूधिया कोहरे से,करवे का चाँद रहा,

पूजा की चौकी पर सज कर बैठा,पत्नी का इंतज़ार रहा,

चलनी से पल-पल झाँकता, प्यार नयन के द्वार रहा,

मुरझाता सा अब वो पूरक,बाहों का हार रहा,

पायल,बिछिया के मातम में ,होठों पर मन का ज्वार रहा,

पायल और चूड़ी का क्रंदन सुनता ,घर ये खाली सा मकान रहा,

लाल ओढ़नी पर भारी ,तिरंगा वो महान रहा,

फिर भी ,वीरता,त्याग तपस्या पर भारी ,अब भी श्रृंगार रहा,

घुलता जो धीरे-धीरे,अब भी उन्हीं के साथ रहा,

आज़ाद परिंदा देखो,पिंजरे को बंजर होने का आघात रहा,

श्रृंगार मिले जब वीर भाव से,दाम्पत्य उनका महान रहा,

अनाथ होते बच्चों के बल से,सनाथ ये हिंदुस्तान रहा,

अपनों की आँखों से गौरव बन बहता,हर वीर जवान रहा,


सैनिक के घर से धीरे-धीरे रिस्ते सुख के बल पर,खुशहाल ये हिंदुस्तान रहा,

नन्हें बालक के हाथों में मुखाग्नि देख,मृत्यु की आँखों में जीवन का मान रहा,

नन्हें कदमों की पद-रज को चूम,रिणी धरती का अभिमान रहा,

सैनिक के घर के मातम के बल पर,जन-गण-मन ये महान रहा,

कुर्बानी का धरती के कण-कण को भान रहा,

निरर्थक-निर्लझ सियासत का ,शर्मिंदा झूठा अभिमान रहा,

नन्हें बालक की आँखों से छलकते दर्द से,गंगा में ज्वार रहा,

हाथों में जो घट था उसमें,ज़िंदा हिंदुस्तान रहा,

चलती लाशों का मौन यहाँ शमशान रहा,

युद्ध भूमि की पावनता का सैनिक को भान रहा,

वन्दे-मातरम मुरझाते होठों पर अंतिम गान रहा,

अम्बर तक लहराता तिरंगा,शहीद के कफन का मान रहा,

युद्ध काल का गौरव, शान्ति युग में चोटिल बलि बेदी का मान रहा,

निज कुटुम्भ के त्याग के बल से ,ज़िंदा हिंदुस्तान रहा।

जिंदा हिंदुस्तान रहा।।

        -प्रिंसी मिश्रा

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