' फ़िरोजा , एक प्रेम कहानी...।


दिल्ली का सल्तनत शासक अलाउदीन खिलजी ने अपने राजसभा में खुद महारावल विरमदेव सोनिगरा चौहान का स्वागत किया, और अपने पास के सिंहासन पर बैठने का आग्रह किया, अलाउदीन खिलजी के राजसभा दरबार मे जालौर के 22 वर्षिय युवराज वीरमदेव का चेहरे का तेज उस समय देखने लायक था, तो कही उम्र के साथ मासूमियत भी देखते बनता था।

जहां राजसभा में बैठे सेनापति और मंत्रियों के  चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ रही थी,वही राजसभा के खंभे की ओट में बैठी अलाउदीन खिलजी की बेटी फ़िरोजा वीरमदेव को एकटक देखे जा रही थी, होठों पे मुस्कान ऐसी की जैसे भोर का सूरज अपनी पहली किरण बिखेर रहा हो और कही बाग में गुलाब खिल रहा हो, उस समय दरबार मे बैठे सभी मे युवराज वीरमदेव सबसे सुंदर लग रहा था।

फ़िरोजा एक नजर में वीरमदेव को दिल दे बैठी,
वीरमदेव और अलाउदीन के बीच कुछ बातों के बाद कुछ दिन ठहरने और दिल्ली घूमने को आग्रह की और युवराज को विश्रामकक्ष में मंत्री से कह के ले जाया गया।

दो चार दिन बीत गया , इधर फ़िरोजा का वीरमदेव के लिए प्रेम एकतरफा परवान चढ़ने लगा, रोज छुप छुप के देखना फ़िरोजा की आदत सी हो गई बस वीरमदेव को देखना सोचना और मन मे बातें करना यही रह गया था।

एक तरफ शाम होते ही मंत्रियों और सेनापतियों सोच के मुस्कुरा रहे थे कि हम अपनी चाल में कामयाब हो रहे है बहुत जल्दी जालौर अपना होगा, मकसद यही था कि वीरमदेव को बंदी बना लिया जाये!

दूसरी तरफ युवराज को नींद ही कहाँ आती थी वो कमरे में ही टहल रहे थे कि एक तस्वीर बेचने वाले ने आवाज दी और युवराज को तस्वीर को देख लेने का आग्रह किया , कहिये युवराज कैसी तस्वीर दिखलाऊ?
वीरमदेव कुछ कहता उससे पहले ही वो एक से एक सुंदर तस्वीरें दिखाने लगा।

युवराज ने देखा सब एक ही नवयौवन युवती का तस्वीर दिखाए जा रहा था जो बहुत सुंदर अनुपम रूपसी थी।
सुनिए, और कोई तस्वीर नही है क्या आपके पास..?

सिर्फ़ एक ही तस्वीर दिखाए जा रहे हो...

युवक ने एक पल जी भर नजर से देखा और बोला क्योकि ये आपसे बहुत प्यार करती है और इससे ज्यादा कोई आपसे प्यार नही करेगा युवराज, युवराज वीरम ये सुनके अवाक रह गए।

'कौन है ये रूपसी.. ? और मुझसे प्रेम कैसे मैं तो इसे जानता तक नही,

.. ये सुल्तान अलाउदीन खिलजी की बेटी फ़िरोजा है युवराज,

और वो फिरोजा मैं हूँ, मुस्कुराती फिरोजा अपनी नकली दाढ़ी मूछ हटाते हुए बोली.. 

बहुत साहसी हो आप, वीरम मुस्कुराते हुए बोला,

..साहसी तो आप हो मेरे दिल के सरताज जो दिल्ली के सुल्तान के हलक में हाथ डाल कर सोना और शिवलिंग छीनने का साहस रखते है, पहली नज़र में मैं आपको दिल दे चुकी हूं और आपसे शादी कर जिंदगी गुजरना चाहती हूँ, आप जितने दिन है यहां मैं हर इक पल आपकी हाँ की इंतज़ार करूंगी, यह कह फिरोजा फिर अपने राजमहल की तरफ चली जाती है।

ये वही पल था जब वीरमदेव फिरोजा के साहस और प्रेम की तरफ झुका और सोचने पर मजबूर हुआ !

युवराज  वीरमदेव धम्म से बिस्तर पर बैठ जाते है और सोचने लगते है ये क्या हो रहा मेरे साथ कही अलाउदीन का ये कोई मेरे खिलाफ चाल तो नही..  कुछ ही महीनों की घटना को युवराज सोचने लगा...

12 वीं शताब्दी के अंतिम वर्षो में जालौर दुर्ग पर चौहान कान्हड़देव का शासन था इनका पुत्र कुँवर वीरमदेव चौहान था जो कुश्ती के प्रसिद्ध पहलवान और कुशल योद्धा था।

ठीक उसी समय दिल्ली के सुल्तान अलाउदीन खिलजी की आक्रमकता लूटपाट और क्रूरता बढ़ती जा रही थी, क्रूरता इतनी बढ़ी की सोमनाथ की मंदिर के सभी सोना लुटकर पुजारियों को मारकर मंदिर ध्वस्त कर दिया हजारों स्त्रियों को बंदी बना लिया और सेनापति उलुग खां को शिवलिंग भी उठा ले चलने को कह दिया।

यह समय वही था जब कान्हड़देव की चेहरे पे चिंता का भाव आ गया था कि किस तरह लुटा हुआ सोना और शिवलिग वापस लाया जाए, वह अपने राजसभा में यही बात का बिचार सेनापति और मंत्री के साथ कर ही रहे थे कि वीरमदेव सारी बातें सुन राजसभा में तलवार लहरा दिया और अपने पिता कान्हड़देव से युद्ध मे जाने की जिद कर बैठा।

कान्हड़देव को अपने बेटे की वीरता और चेहरे पर क्रांति की ज्वाला से परचित थे, उन्होंने वीरमदेव को युद्ध मे जाने की आज्ञा दे दी।

वीरमदेव एक छोटी से सैनिक की टुकड़ी ले रात पहर में ही उलुग खां के लगाए कैम्प खेमे में धाबा बोल दिया जमकर युद्ध हुआ,उलुग खां वीरमदेव के वीरता के आगे भाग खड़ा हुआ, जीत आखिर जालौर युवराज वीरम की हुई सभी स्त्रियों सोना और शिवलिंग को छुड़ा लाया।

यह खबर सुन अलाउद्दीन आग बबूला हो गया और जालौर पर चढ़ाई करने की सोचने लगा,पर अपने मंत्रियों के कूटनीति सलाह से कान्हड़देव से संधि और वीरमदेव को दिल्ली निमंत्रण पर बुलाया, अचानक दरवाजे पे आवाज सुनाई देती है वीरम सोच से बाहर निकलता है...

"युवराज की जय हो आपको सुल्तान ने याद किया है..अलाउदीन खिलजी युवराज से बताता है कि आपका पिताजी का संदेश है कि आप ठीक तो है मेरे यहाँ,कुछ दिन और बीतता है फिरोजा की बेचैन हालत तो वीरम को देखने से ही दिल को सकून मिल रहा था,आखिर कब तक छिपता, इश्क और वो भी इकतरफा और जुनून पैदा करता है धीरे धीरे ये बात सुल्तान तक पहुँच ही गई," ये मैं क्या सुन रहा हूँ फिरोजा..?फिरोजा के चेहरे पर डर बिल्कुल नही था.." आप बिल्कुल सही सुने है मैं युवराज वीरमदेव को दिल दे बैठी हूँ और विवाह करना चाहती हूँ,' ये  कभी संभव नही हो सकता फिरोजा तुमको सब भूलना होगा,पर अपनी क्रूरता के आगे कभी अलाउदीन जाना ही नही की इश्क़ होता क्या है जो फिरोजा जान गई थी ,फिरोजा सुल्तान को अपना फैसला सुनाती है  " वर वरुं तो वीरमदेव   ना तो रहूंगी अकन कुँवारी !!

सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को अपने बेटी के लिए झुकना पड़ा और वो विवाह के लिए हाँ कर देता है।

दरबार लगता है वीरमदेव को बुलाया जाता है, सुल्तान युवराज को फिरोजा से विवाह के लिए इस्लाम धर्म अपनाने को कहता है, वीरमदेव इस बात पर बिचार करने के लिए समय मांगता है, तभी सुबह होते ही जालौर से युवराज के लिए लौटने का संदेश आता है,
फिरोजा दुखी हो जाती है, वह वीरम को छोड़ने यमुना नदी तक आती है।

"अब लौट जाओ फिरोजा अपने महल,
.. कैसे लौट जाऊं ,आपने मेरे प्रेम का जबाब अभी तक नही दिए जबकि मैं तन और मन से आप को ही अपना पति मान चुकी हूं,

" इस समय और अभी मैं कुछ नही कह सकता, इसके लिए अपने पिताजी से बात करूंगा।

तो फिर मुझे छूकर कसम खाइये की आप अपने पिताजी से बात करेंगे,

नही फिरोजा मैं आपके प्रेम की कद्र करता हूँ पर आपको छू नही सकता, पर अपने पिताजी के सामने ये बात जरूर रखूंगा,

"मैं हर रोज यही इंतज़ार करूंगी आपकी आने का राह देखूंगी और आप जो नही आये तो सुन लीजिए मेरी जिंदगी आपकी हो गई है आप नही तो मैं भी नही,

सूरज धीरे धीरे अपने ढलान पे आ गया था आकाश में लाली अपनी सिंदूरी रंग बिखेर चुकी थी, धीरे धीरे वीरमदेव फिरोजा की आखों से ओझल हो गया,

जालौर पहुचकर युवराज ने  अपने पिताजी को सब हाल सुनाया बस  फिरोजा वाली बात छोड़कर..
" युवराज वीरम मुझे आपसे एक बात करनी थी बहुत जरूरी,
युवराज भी बोल उठा , मुझे भी आपसे एक बात करनी थी पिताजी,

तो ठीक है बोलो क्या बात है,
"नही पिताजी पहले आप बोलिये,

बेटा मैं चाहता हूं उलुग खां के चुंगल से छुड़ाई हुई स्त्रियों में से एक से तुम शादी करो ताकि और भी इस राज्य के युवक सभी स्त्रियों को अपना सके,

वीरमदेव अब ये बात कैसे टाल सकते , हाँ करना पड़ा,
नियति को कुछ और ही मंजूर था उसी समय अलाउदीन खिलजी का दूत कान्हड़देव को फिरोजा विवाह प्रस्ताव सुनाया, जो बात वीरमदेव अपने पिताजी को नही बताए,

कान्हड़देव ने वीरम के तरफ देखे,
आप निश्चित रहिये पिताजी मैंने कोई ऐसा जबाब नही दिया है ,

तभी युवराज ने दूत से कहा..

    " मामा लाजै भाटिया कुल लाजै चाह्ममान
      जै ते परणु तुर्कसी पश्चिम उगै भान !!

अर्थात मैं एक तुर्कनी से शादी नही कर सकता अपने मामा या खानदान या कुल को कलंकित नही करना चाहता ना सूरज पश्चिम से उगेगा ना ये शादी होगी।

दूत प्रस्ताव लेकर चला जाता है इधर वीरमदेव सोमदेव की दास कन्या से शादी कर लेता है क्योकि कान्हड़देव और वीरमदेव को पता रहता है कि ये बात दिल्ली सुल्तान कभी बर्दाश्त नही करेगा और युद्ध करेगा।

होता भी वही है फिरोजा की अब जिद होती है कि किसी तरह युवराज वीरमदेव को मेरे सामने लाया जाए।

युद्ध होता है जालौर पूरी ताकत और बहादुरी से लड़ता है लेकिन कब तक आख़िर वीरमदेव की गर्दन धड़ से अलग हो जाती है वीरम की सिर को एक थाली में रखकर फिरोजा के सामने लाया जाता है, फिरोजा का रोकर बुरा हाल था और तब जब उसका प्रेम सामने पड़ा था।

वह बोल उठी , वीरम के कटे सिर से की "अब तो विवाह हो सकता है न युवराज वीरमदेव , और जैसे ही छूने की कोशिश की वीरमदेव का सिर पलट गया,पास खड़ी दासी से फिरोजा पूछ बैठी...

" सुनो बताओ हिन्दू धर्म में जिसका पति मारा जाता है युद्ध मे तो उनकी औरते क्या करती है..

" जौहर प्रथा करती है अपने पति के साथ साथ वो भी जान दे देती है- पर किसी पराये को अपने शरीर को छूने नही देती,

" ठीक है फिर तुम कुछ देर मुझे युवराज वीरम के साथ अकेला छोड़ दो,

चांदनी रात में फिरोजा अकेले चुपके से यमुना नदी के किनारे जाती है और मृत वीरम के चेहरे और होठों को जी भर चूमती है और कहती है "जीते जी आपने अपना सर मेरी धड़कनों पे ना रख पाए ना सुन पाये ,पर मुझे बिश्वास है मेरा प्यार सच्चा है तो जरूर मिलेंगे किसी जन्म में तब आप मेरी गोद मे अपना सर रखकर अपने प्रेम का इजहार करना ऐसे चुप ना रहना, मैं भी आपके लिए जौहर कर्तव्य निभा रही हूं ताकि तुम्हारे अलावा मुझे कोई और ना छू सके, और फिर फिरोजा वीरमदेव के होठों को चूम सीने से लगाकर यमुना में कूद गई !

और सुबह यमुना नदी में मछुवारों को वीरम का सिर फिरोजा के बाहों में बहता हुआ पाते है........!



लेखक - आकाश कुशवाहा
 (पेशे से इंजीनियर पर कलम से शब्दों को बुनने में इतने माहिर हैं कि कोई भी इन्हें इंजीनियर नहीं कहेगा। भारत में कम रहते हैं पर इनका दिल हिंदुस्तानी हैं।)

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