कितना बेस्वाद सा लगता है।




धुंआ भभक कर आसमां में ,
मांस के लोथडे सा बिखर गया है
इंसानी फितरतों ने
कारखानों की भठ्ठियों में
आंंच भड़का दी है शायद,
कारखानों में जलती आग ने
आंखों का पानी
हथेलियों की नमी सोख ली है
अब,
कितना बेस्वाद सा लगता है
कुदरती हवा को
सीने में दम तक भरना
जल्द ही छटपटा के
वादा तोड़ देना,
गांव की धूलभरी सड़क पर बैठकर
सोच ही रहा होता हूं, कि
प्यार करना शायद मुझे
कभी नहीं आयेगा.

तभी वो आ रही होती है
उसके सुन्दर चेहरे की
तीखी नाक,
इंसानी फितरतों के वहसीपन से
गुस्से में लाल है
लम्बे बालों की चोटी में
गुथी दर्जनों शिकायत,
मेरी खामोश सीने में
एक-एक कर उतार देती है
लोहे की कारखाने में बनी बुलेट...
बेसुध,
उसके गले तक लिपटकर
जीने की ख्वाहिश लिये
लौट जाता हुं
हर बार की तरह ,

उसके,
होटों के खुबसूरत अभ्र को
शोख शरारतों को
लहराते-उलचते बालों को
कच्चे-पके शिकायतों के बेबाकी को
इंतजार की छवि को
मेरी,
जेहन में उतर कर घंटों बातें करती
हर उस अफसाना का,
इन सबके अलवा भी बहुत कुछ है

जिनको मैं,
साफगोई से
दिल के धधकते
कारखाने में ढ़ाल
लेना चहता हू
कि कम से कम,
मोहब्बत में डूबे
जीवन का जिक्र इतना हो कि
लोहा कारखाने की पसलीयों ने
बल पड़ जाय ...


By- पवन मौर्य

 (बनारस के बैचलर है शब्दों की नजाकत और चयन ने इन्हें बनारस से महाराष्ट्र में ला खड़ा कर दिया है।)

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