ये कैसी बेबसी है आडवाणीजी।


परिवार के बुजुर्ग जब हाशिए पर चले जाते हैं तो घटना-दुर्घटना पर दु:ख या खुशी जाहिर करने के अलावा उनके हिस्से में कुछ नहीं आता। भाजपा को भाजपा बनाने वाले चुनिंदा नेताओं में शुमार रहे लालकृष्ण आडवाणी इन दिनों इसी दौर से गुजर रहे हैं। उनकी नजर में संसद की तबीयत खराब है और वे इस बात को लेकर बेहद दु:खी हैं। वे विवश हैं कि इस बात को जाहिर करने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते। सबकुछ जानते-बुझते हुए चुप रहने की विवशता क्या होती है, उनसे बेहतर अभी शायद ही कोई और समझ सकता होगा। 

ऐसा नहीं लगता कि आडवाणीजी की स्थिति भीष्म पितामह जैसी हो गई है, जिनका सारा पराक्रम हमेशा दूसरों के काम आया। उन्होंने कंधे ऊचकाकर दूसरों को सत्ता की आसंदी तक पहुंचाया, लेकिन किसी ने भी हाथ बढ़ाकर उन्हें ऊपर लेने की कोशिश नहीं की। उनके सार्वजनिक जीवन को जब आप किसी किताब की तरह पढऩे की कोशिश करते हैं तो हर पन्ने पर एक खालीपन नजर आता है। एक योद्धा जो पार्टी का इकबाल बुलंद करने के लिए बार-बार रथयात्राएं करता है। ढेर सारी अच्छाई-बुराई ओढ़ता है, चुनौतियों से जूझता है। गांव-गांव जाकर लोगों के दिल जीतने की कोशिश करता है और उनकी सारी धडक़नें इकट्ठा कर पार्टी की सांसों को समर्पित कर देता है। पार्टी का पौधा फल-फूल जाता है, लेकिन उनके हिस्से में बित्तेभर छांह से ज्यादा कुछ नहीं आता। वे माइल स्टोन की तरह वहीं ठिठक जाते हैं, दूसरों को रास्ता बताते हैं, लेकिन खुद उस रास्ते पर चलकर मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। 

ये आडवाणी ही थे ना जिन्होंने भाजपा के हिंदुत्ववादी चेहरे को पहचान दिलाने के लिए हजारों किमी की यात्राएं की। जब इसी हिंदुत्व के दम पर पार्टी सत्ता के करीब पहुंचती नजर आई तो वही आक्रामक छवि उनकी राह का रोड़ा बन गई। उन्होंने खुद उदारवादी छवि वाले अटलजी का नाम आगे बढ़ाया, ताकि साझा सरकार को आकार दिया जा सके। अटलजी के कार्यकाल में गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री रहे, लेकिन इससे आगे नहीं बढ़ पाए। मेरे मित्र कह सकते हैं कि आड़वाणीजी ने अपना जीवन संगठन को सौंप दिया था और संगठन में व्यक्तिगत उपलब्धियां गौण होती है, लेकिन उनके चेहरे का खालीपन कई बार इस रिक्तता का दर्द बयां करने से नहीं चूकता। एक बार तो उन्होंने कहीं कहा भी था कि मैंने अटल जी का नाम आगे बढ़ाया था, लेकिन वे मेरे लिए ऐसा नहीं करेंगे। 

वे पीएम इन वेटिंग के रूप में राजनीतिक इंतजार की मिसाल बनकर रह जाते हैं,  तमाम उम्मीदों के विपरीत पार्टी सत्ता से वंचित रह जाती है तो सारे समीकरण बदल जाते हैं। पाकिस्तान में जाकर जिन्ना के मकबरे पर चार आंसू क्या बहाए मानो आंसू ही नियती बन गए। जो आक्रामकता उनके राह का रोड़ा बनी थी, पार्टी वही जूझारुपन किसी दूसरे नेता में ढूंढती है और उसे ही साहबे मसनंद बनाने में जुट जाती है। जितना बड़ा कद उतनी बड़ी परछाई। जीवनभर के संघर्षों का जब फल मिलता है, पूर्ण बहुमत के साथ देश की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने का सपना पूरा होता है, लेकिन उन्हें सत्ता तो दूर संगठन में भी दरकिनार कर दिया जाता है। नोटबंदी की तरह उम्र बंदी लागू कर दी जाती है, आप 75 से ऊपर के हैं तो अब पराक्रम से परहेज कीजिए और सिर्फ परामर्श दीजिए। 

राजनीति की तमाम किताबें खंगाल लीजिए, सत्ता कभी किसी परामर्श मंडल की बांदी नहीं रही। धृतराष्ट्र की सभा में पितामह भीष्म और विदुर जैसी शख्सियतें थीं, लेकिन फिर भी द्रोपदी का चीरहरण नहीं रोक पाए। हस्तिनापुर से जुड़े रहने के सबसे बड़े दु:खों में एक दु:ख यह भी है। इतिहास में ऐसे कई किस्से मशहूर हैं, जिसमें सत्ता में आते ही सबसे पहले मशवरा देने वालों की जुबान पर ताले लगाए गए। सत्ता की सोच-समझ को चुनौती देने वाले लोगों को साथ रखने का साहस कितने लोग जुटा पाते हैं। 

इसलिए आडवाणी जी जब संसद के मौजूदा हाल पर दु:ख जताते हैं, तो उसमें उनके भीतर की बेबसी अधिक महसूस होती है। उनके चेहरे का सूनापन आपके भीतर भी कोहरा भर देता है। विचाराधारा पर सहमति और असहमति को परे रखकर यह सोचने पर विवश कर देता है कि क्या किसी पार्टी के लिए पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले यशस्वी राजनेता का यही हासिल है। 

यह राजनीति का ऐसा स्याह पक्ष है, जो पार्टियों में अंधेरे की नई इबारत लिख रहा है। उनमें एक निर्वात बना रहा है, जिसके कारण वहां अब सिर्फ नेतागिरि होने लगी है। कार्यकर्ता वाला भाव हाशिए पर जा रहा है। नींव के पत्थर ताउम्र इमारत संभालते-संभालते थक गए हैं, उन्हें कंगुरों पर जगह भले न मिल पाए, लेकिन नींव में होने की इज्जत तो चाहिए ही और जब सम्मान का हक भी न मिले तो क्यों कोई और अपना जीवन यूं दान करेगा।


By - आनंद मंडलोई

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