वह अब स्त्री नहीं कहलाना चाहती थी।


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परिधि में बँधकर/ आस्तित्व की यात्रा

उसका अपना साथी जो उसके मुकाबले अब अधिक बलिष्ठ था, उसका ही शिकार करने के उद्देश्य से उसे घूर रहा था। हृदय काँप गया।

सहमती हुई वह याद करने लगी उन दिनों को जब दोनों एक साथ शिकार करते, साथ मिलकर लकड़ियाँ चुनकर लाते, आग सुलगाते, माँस पकाते, साथ-साथ खाते और सहवास के दौरान एक दूसरे का बराबरी से सम्मान भी करते थे।

तब वे दोनों असभ्य, अविकसित जीव  शिकारी होकर भी  परिपूर्णता को जिया करते थे।

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उस दिन जब उसके गर्भवती होते ही दूसरे ने उसके लिए घर बनाने का सोचा था, प्रसवित जीव को केन्द्र में रखकर दोनों ने जब अपने लिए कार्यक्षेत्र का विभाजन किया था। तभी से वह प्रसवित जीव की देखभाल करने के लिए घर बनाकर उसमें रहने लगी और शनैः शनैः कोमल शरीर धारण करने लगी थी, उसे कहाँ मालूम था कि समय बीतने पर वह इन्हीं बातों के कारण स्त्री कहलाएगी।

उसने पनियाई आँखों से उसके शिकार को उद्दत अपने साथी की बलिष्ठ भुजाओं की ओर देखा, फिर अपने कमजोर शरीर पर नजर फेरी।  वह ठिठकी, आँखों में कठोरता उतर आयी। वह फिर से प्रसवित जीव को अपने साथ ले, घर से बाहर शेरनी बनकर स्वयं के पोषण के लिए शिकार करने निकल पड़ी।

वह अब स्त्री नहीं कहलाना चाहती थी।


लेखिका - कांता रॉय



Comments

  1. अच्छा लगा अपनी लघुकथा यहाँ देखकर। प्रकाशक महोदय जी को हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ।

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  2. आभार कांता जी आपका आप यूँही लिखते रही है।

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