पढ़िए गोपाल यादव का ये लेख दिलचस्प 'नोटबन्दी'।

  


 'नोटबन्दी' ये सिर्फ एक शब्द नहीं है ये एक पूरा का पूरा वाक्य है अपने आप में। ये एक भाव है अनेक किस्सों को जताने का। ये जज़्बात है 'भाजपाइयों' का। ये शान है 'भाजपा' की। 

ख़ैर अगर अगर नोटबन्दी की परिभाषा की जाए तो वो तो पिछले साल से हजारों लाखों बनी जबसे इसने जन्म लिया। किसी ने इसे 'डिमनीटाइजेशन' कहा तो किसी ने इसे 'लड़कियों के साथ होने वाले मोलेस्टेशन' परिभाषित किया। परिभाषायें कई बनी। 

कुछ किताबी थीं, कुछ इंटरनेटी थी तो कुछ बुद्धजीवियों के दिमाग की उपज। किसी नेता, अभिनेता या खिलाड़ी से ज्यादा चर्चित रहने वाली नोटबन्दी को एक साल बीत गए मगर वह लोगों की ज़बान पर विराजमान है। इसके घाटे मुनाफे कई बताये गए। जिसको जो लगा, जो अनुभव हुआ वो बताया गया। पक्ष विपक्ष इसको लेकर अक्सर खींचतान किये रहते हैं। नोटबन्दी से न तो मुझे कोई मुनाफा हुआ है और ही कोई नुकसान ही सहना पड़ा। हाँ, एक गज़ब का अनुभव जरूर मिला वो लंबी लंबी लाइनों में लगकर। कुछ चाचा दादा से हँसी ठिठोली में भी हाथ आजमाने शानदार मौका मिला।

ख़ैर ये सब तो बात की बात है। आज मुझे नोटबन्दी के कुछ दिलचस्प फायदे नजर आये। लोग कुछ भी कहें मगर आज मुझे नोटबन्दी पर गर्व करने का मन कर रहा है। अक्सर कोई अगर शेर-ओ-शायरी फरमाता है तो लोग पूछ पड़ते हैं कि क्या ग़म है आपको। आखिर किसने दिल तोड़ दिया। मगर क्या किसे ने सोचा था कि नोटबन्दी से भी लोग शेर, शायरी व कविता करने लग जाएंगे। आज भी सोशल मीडिया पर अनेक लोगों के चुटकुले, शायरी, कविता व कहियानियाँ मिल जाती हैं जो लोगों ने इतनी सिद्दत से लिखी होती हैं कि कोई भी उन्हें तज़ुर्बेकार शायर, कवि अथवा लेखक मानने पर मजबूर हो जाये।

आज महिलाएँ तो वैसे किसी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। हर क्षण वह मर्दों की बराबरी करती नजर आती हैं लेकिन नोटबन्दी ने उनके अंदर के फनकार को भी जीवित कर दिया। फिर उनकी प्रतिभा के जो नमूने देखने को मिले उन पर हर किसी की वाह मिली फिर चाहे वह कोई कविता कहानी रही हो या कोई चुटीला गाना। सोशल मीडिया पर अनेकों ऐसे वीडियोज देखने को मिल जाएंगे जो उनकी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं। ये सब नोटबन्दी की ही करामात तो है।

गाँव गाँव फैलता डिजिटलीकरण नोटबन्दी का ही नतीजा तो है। लोगों को ऑनलाइन लेन देन उस समय जो मजबूरी लगती थी आज उनके जीवन का हिस्सा बनती नजर आ रही है। वैसे तो समय को देखते हुए किसी की ज़बान को शुद्ध कहना संशय भरा कथन है मगर अगर ऐसा रहा भी था तो नोटबन्दी ने उसे खूब गलत शब्द सिखाए हैं। कालाधन बाहर आया हो या न आया हो मगर पत्नियों के 'ग्रे मनी' पर गाज जरूर गिर पड़ी। नोटबन्दी बीते एक साल के ऊपर हो गए लेकिन इससे किस्से और किस्सागोई निरंतर जारी है।



By - गोपाल यादव





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