क्यों न ट्रैफिक पुलिस से रिप्लेस कर दें सीबीआई को।



2 जी घोटाले के बाद महाराष्ट्र के आदर्श सोसायटी घोटाले में भी सीबीआई ने अपना आदर्श बरकरार रखा है। अशोक च्वहाण अपनी इज्जत समेत दोषमुक्त कर दिए गए हैं। कल चारा घोटाले का फैसला आ सकता है। इसमें भी यह रवायत जारी रहने की पूरी संभावना है। आखिर देश की जांच एजेंसी पर अपना चरित्र बनाए रखने की भी पूरी जवाबदेही है। 

देश के विजिलेंस कमिश्नर रहे आर श्रीकुमार ने लोकायुक्तों की कॉन्फ्रेंस में सीबीआई को लेकर अपनी एक महत्वपूर्ण स्टडी साझा की थी। उन्होंने कहा कि 26 बरसों में भ्रष्टाचार के मामलों में सीबीआई का कन्विक्शन रेट महज 3.96 फीसदी रहा है। उनकी स्टडी के अनुसार उन पांच वर्षों में सीबीआई ने भ्रष्टाचार के 264 केस दर्ज किए थे, जिनमें 698 आरोपी थे। इनमें से 486 केंद्र व राज्य सरकारों के कर्मचारी तो 212 अन्य लोग थे। यह सीबीआई का ही शौर्य था कि वह इनमें से सिर्फ 8 लोगों को सजा दिला पाई थी। हालांकि चर्चित मामलों में तो हमें यह शून्य के आसपास ही नजर आता है। 

पिछले कुछ वर्षों के ही मामले उठाएं तो गिनती के मामले ऐसे मिलते हैं, जिनमें सीबीआई ने खुद को साबित किया हो। इनमें सत्येंद्र दुबे मर्डर केस, सिस्टर अभया की हत्या का मामला, राजस्थान का चर्चित भंवरीदेवी केस नजर आता है। आर्थिक अपराधों के मामले में सत्यम केस भी ऐसे ही गिने-चुने मामलों में शामिल है। इसके अलावा ढूंढने की कोशिश करेंगे तो निराशा ही अधिक हाथ लगेगी। 


ये और बात है कि केंद्र के मंत्री इससे ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखते। अगस्त 2017 में संसद में केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र मिश्रा ने जो आंकड़े रखे, उसके अनुसार 2014 में सीबीआई का ओवरआल कन्विक्शन रेट 69.2 फीसदी था, जो 2016 में 66.8 फीसदी रह गया। मिश्रा जी कहते हैं, 28 फरवरी 2017 तक देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के पास 1174 केस लंबित थे। इनमें से 157 दो साल से, 35 केस पांच से भी अधिक वर्षों से , 6 दस वर्षों से और 2 केस 15 से अधिक वर्षों से लंबित है। यानी सीबीआई उन केसेस पर धर्मेंद्र की तरह सबूत पीसिंग एंड पीसिंग एंड पीसिंग ही कर रही है। नतीजा क्या होगा, हम सब जानते हैं। 

चर्चित मामलों को देखें तो ज्यादातर में सीबीआई को मुंह की खाना पड़ी है। बोफोर्स घोटाला इसकी सबसे बड़ी नजीर है। 64 करोड़ रुपए के इस घोटाले की जांच में माननीय सीबीआई ने 250 करोड़ रुपए खर्च कर दिए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। हद तो तब हुई जब लंदन की अदालत में खुद सीबीआई ने क्वात्रोची के अकाउंट डीफ्रीज करने की दलील दी, जबकि 10 साल तक वह इस बात के लिए संघर्ष करती रही कि क्वात्रोची के अकाउंट सील ही रहना चाहिए, क्योंकि उनमें दलाली का पैसा जमा हुआ है। 

झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों की खरीदी के मामले में तो सीबीआई ने रिश्वत की रकम तक रिकवर कर ली थी। बताते हैं कि सीबीआई अफसरों ने बड़ी चतुराई से शिबू सोरने के घर फोन किया। फोन उनकी पत्नी ने उठाया। अफसर ने उनसे बस इतना पूछा कि भाभी, दादा कोई बैग-वैग लाए हैं, क्या। भोली पत्नी ने जवाब दे दिया हां, बैग है और उसमें रुपए भरे हैं। इसी मामले में सोरेन के निजी सचिव शशिनाथ झा हत्याकांड में निचली अदालत ने सोरेन को सजा भी दी, लेकिन हाई कोर्ट से बरी हो गए। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जहमत ही नहीं उठाई।


ऐसे ही लालू प्रसाद यादव पर लगाए गए आय से अधिक संपत्ति का आरोप भी साबित नहीं किया जा सका। ताज कॉरिडोर घोटाले के समय मायावती पर लगाया गया बेहिसाब संपत्ति के मामले में करीब 10 साल तक इकट्ठे किए गए सबूत भी दम नहीं धर पाए। सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आपको केस करने की अनुमति ही नहीं दी गई है। एफआईआर ही निरस्त हो गई। ऐसे ही छत्तीसगढ़ विधायक खरीदी कांड में अजीत जोगी की टेलीफोनिक बातचीत की रिकार्डिंग भी थी और समर्थन की चिट्ठी भी। बावजूद इसके कानूनी पेंच का हवाला देते हुए सीबीआई ने केस बंद कर दिया। 

इनके अलावा जैन बंधुओं की डायरी से बाहर आए हवाला कांड का भी यही हश्र हुआ। नेता और नौकरशाह बरी हो गए। इसी वर्ष सितंबर में केस का आखिरी आरोपी भी बरी हो गया। सिख विरोधी दंगे, वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाला, एचडीडब्ल्यू स्कैंडल जैसे कई मामले हैं, जिनमें सीबीआई कुछ नहीं कर पाई। जबकि एचडीडब्ल्यू स्कैंडल में जर्मन कंपनी ने मान लिया था कि उसने एजेंट को 7 फीसदी कमिशन दिया है। बावजूद इसके सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल किए बगैर ही क्लोज कर दिया। 

ऐसे में लगातार विफल हो रही सीबीआई को क्यों न ट्रैफिक पुलिस से रिप्लेस कर दिया जाए। कोर्ट में अपने ही चालान और चार्जशीट साबित करने में असफल सीबीआई कम से कम चौराहों पर तो चालान काट ही सकती है। हालांकि इस काम में उन्हें आनंद वैसा ही आएगा। यहां भी जब वे ट्रैफिक रूल तोडऩे पर किसी को रोकने की कोशिश करेंगे, उसे छोडऩे के लिए ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं से दबाव आ ही जाएगा।



By- अमित मंडलोई

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