क्लासिक सिनेमा : फिल्म 'गाइड' : एक :


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फिल्म ऐसी होती है जो जनमानस में गहरी पैठ बनाती हैं, उनमें से एक है 'गाइड'. सन1965 में बनी यह फिल्म प्रदर्शन की शुरुआत में पिटने लगी, फिर धीरे से उठने लगी और खूब चली, अब तक चल रही है. आर.के.नारायण की लिखी, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत (1960), कहानी 'द गाइड' को कुछ उलट-फेर के साथ 'गाइड' के नाम से इस फिल्म को नवकेतन इंटरनेशनल के बैनर तले बनाया गया, निर्देशक थे विजय आनंद. राजू गाइड और रोजी के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय अत्यंत साहसिक था क्योंकि इसकी कहानी का स्वाद उस समय की सामाजिक सोच के अनुरूप नहीं था. 

कहानी जबरदस्त थी, रोजी नाम की लडकी जिसकी पति से नहीं पटती. वह अपने पति को किसी अन्य स्त्री के साथ रंगरेलियां करते देख कर राजू गाइड से प्रेम करने लगती है. राजू का परिवार रोजी को स्वीकार नहीं करता क्योंकि रोजी एक वेश्या की बेटी थी. घर से विद्रोह करके राजू अपनी रोजी के साथ अलग रहने लगता है. राजू रोज़ी को नृत्यांगना बनने के लिए प्रोत्साहित करता है और उसकी नृत्य प्रतिभा को समाज के समक्ष प्रस्तुत करके स्थापित करता है. वह लोकप्रिय होकर 'स्टार' बन जाती है. इस बीच राजू को जुए और नशे की लत लग जाती है. एक दिन अचानक रोजी का पूर्व पति रोजी से मिलने के लिए आता है, राजू को डर था कि रोजी कहीं उसे छोड़कर चली न जाए इसलिए वह उसे मिलने नहीं देता और झूठ बोलकर एक जालसाजी कर बैठता है. रोजी और राजू के संबंधों में खटास आ जाती है. जालसाजी के अपराध में उसे दो वर्ष की सजा हो जाती है. जेल से रिहाई होने के बाद राजू अभाव और अकेलेपन के कारण अनाश्रित इधर-उधर भटकते रहता है. एक दिन वह एक गाँव के मंदिर के अहाते में सो जाता है और अगली सुबह एक साधु ठण्ड से ठिठुरते हुए राजू के ऊपर पीला वस्त्र ओढ़ा देता है. गाँव वाले राजू को भी साधु समझने लगते हैं. एक ग्रामीण की पारिवारिक समस्या का समाधान कर देने के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ जाती है. उसी समय गाँव में अवर्षा के कारण अकाल की नौबत आ जाती है. गाँव वाले राजू को वर्षा के लिए उपवास करने का आग्रह करते हैं. राजू उनका मन रखने के लिए मजबूरन उपवास करता है और उनके विश्वास की रक्षा करते-करते अपने प्राण त्याग देता है. 

एक विवाहित स्त्री की दुनियावी आज़ादी का साहसिक चित्रण उस समय भारतीय जनमानस के गले उतरना असंभव था लेकिन विजय आनन्द के कसे हुए निर्देशन, वहीदा रहमान के अभूतपूर्व अभिनय व नृत्य, फली मिस्त्री की मनभावन फोटोग्राफी, शैलेन्द्र के हृदयस्पर्शी गीत तथा सचिनदेव बर्मन के संगीत ने ऐसी कलाकृति को साकार कर दिया जो सिनेमा के परदे से लोगों के दिल में उतरकर आज भी प्रकाशित है. (क्रमशः)


लेखक - द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
 ( साधारण सोच वालासामान्य मनुष्य)

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