झामपंथी और मरी हुई संवेदनाओ वाले लिबरल देशवासियो।



आज ख़बर आयी कि कर्नाटक में एक व्यक्ति की भीषण वीभत्स और क्रूर से क्रूरतम तरीके से हत्या कर दी गयी, नाम है उनका परेश मेस्ता। चूँकि उनका नाम परेश है तो अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया में एक व्यक्ति की हत्या की खबर चलाई जा रही है। वही अगर उनके टोपी में छेंद होते तो ख़बर होती कि हिंदुस्तान में एक मुसलमान की हत्या, क्या यहाँ अल्पसंख्यक सुरक्षित है?

अरे यहाँ बहुसंख्यक ही नही सुरक्षित है,आप अलसंख्यक का रोना रोते है। उसी पीड़ित - दमित और अमनपसंद कौम के रहबरदारों ने परेश मेस्ता को जीते जी दोजख दिखाते हुए मौत के घाट उतारा। अल्लाह के बाशिंदे परेश का सिर फोड़ते है, उसके चेहरे पर खौलता तेल डालते है और उसके गुप्तांग भी काट देते है। दीन-ईमान की कसमें खाने वाले इन मज़हबी जिहादियों के इस कुकृत्य को लिखते वक़्त भी हाथ कांप रहे है, न जाने किस कलेजे के साथ इन्होंने परेश को इतनी भीषण सजा दीं।

ये हत्या सिर्फ़ एक व्यक्ति की हत्या नहीं हो सकती, बल्कि ये मजहबी यलगार है। एक मज़हब के ख़िलाफ़ दूसरे मजहब का गुस्सा है। ऐसी घटनाओं पे झामियों को सांप सूंघ जाता है। जेएनयू छाप माओ के अवैध वंशज को अब देश खतरे में नही जान पड़ता। देश के खिलाफ नारे लगाने पे जब पुलिस उनको गिरफ़्तार करती है तो वो रोना रोते है कि देश मे हिटलरशाही आ गयी है, देश वैचारिक आपातकाल की गिरफ्त में है।

और ये जो लिबरल टट्टू है, इनका मुँहचौरा भी अवार्ड वापसी के समय परवान चढ़ता है, तभी इन्हें देश असहिष्णुता में दिखता है। बाक़ी समय तो ये भुजिया खा के पार्टनर संगे फ़ोटो ही डाला करते है। एकाध दो लाइन की शायरी चेंप दी, ज्यादा हुआ तो दक्षिणपंथ को गरिया लिया, मनुवाद को गरिया दिया। अच्छा हाँ! इन्हें 2000 वर्षो के शोषण का खूब याद रहता है मगर आज की हालत पे कुछ नही बोलते ये।






By - संकर्षण शुक्ल 






फ़ोटो क्रेडिट - India today group

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