घरेलू महिला जब समझकर कदम बढ़ाती है तो सोनिया बन जाती है।



सोनिया 62 दिन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्य से राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गई थीं। इसके पहले पूरे सात बरस तक उन्होंने कांग्रेसियों को झुलाया। वे बार-बार मिन्नतें करते रहें, लेकिन वे कांग्रेस ज्वॉइन करने को तैयार ही नहीं हुईं। फिर जब कांग्रेस ज्वॉइन की तो तमाम अवरोध और उतार-चढ़ाव को परे रखकर उसे शीर्ष तक ले गईं। और अब जब फिर पार्टी की स्थिति डांवाडोल है, उसे नई जमीन देने के लिए खुद अलग हो गईं। इतने उतार-चढ़ाव के बीच खड़े रहने, लडऩे और मुकाम हासिल करने का माद्दा हाउस मैनेजमेंट से ही आता है। 

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी ने 19 बरस का सबसे लंबा कार्यकाल संभाला है। इन वर्षों के पहले उनके पहचान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की प्रेमिका, पत्नी और इंदिरा गांधी की बहू के रूप में ही रही है। जितना नाम है, उससे कहीं ज्यादा विवाद भी उनके साथ जुड़े रहे हैं। शायद राजीव के साथ शादी के साथ ही विवादों और विरोधाभासों की शाल उन्होंने ओढ़ ली थी। देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार का बेटा विदेशी बहू लेकर आया था, उस दौर में यह बात भी क्या कम विवादित थी। 


पहला विवाद यहीं से शुरू हुआ। वे इटली की थीं, केम्ब्रिज में इंग्लिश पढऩे गई थीं। वहीं के वर्सिटी रेस्टोरेंट में काम करती थीं, जहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे राजीव से उनकी मुलाकात हुई। रोमन कैथोलिक परिवार की बेट ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार राजीव से शादी की और सोनिया गांधी बन गईं। राजीव पायलेट थे और वे घर संभालती थीं। तब राजनीति से उनका इतना ही नाता थी कि वे इंदिरा की बहू थीं और उनके साथ एक ही घर में रहती थीं। उस वक्त उन्हें न भारतीय भोजन पसंद था और न ही पहनावा। इसलिए पहला विवाद मिनी स्कर्ट में सामने आए उनके एक फोटोग्राफ पर ही शुरू हुआ। 

फिर वह दिन आया जब इंदिरा जी की उन्हीं के बॉडी गार्ड ने हत्या कर दी। पूरे समय वहां एम्बुलेंस खड़ी रहती थी, लेकिन उस वक्त ड्राइवर कहीं चला गया था। एक कार की पिछली सीट पर इंदिरा जी को रखा गया। वे सोनिया की गोद में सर रखकर ही अस्पताल तक पहुंची थी। इंदिराजी की हत्या के बाद राजीव को राजनीति में कूदना पड़ा। वे अमेठी से चुनाव मैदान में उतरे तो सामने कोई और नहीं उनकी भाभी मेनका गांधी ही उन्हें चुनौती दे रही थीं। यह पहला मौका था जब सोनिया भी राजीव के साथ प्रचार में शामिल हुईं और अपनी देवरानी के खिलाफ प्रचार किया। राजीव जीते और प्रधानमंत्री बने। 


इसके बाद वे लगातार राजीव के साथ साये की तरह रहीं, लेकिन राजनीति में कोई दखल नहीं दिया। यहां तक कि देश की नागरिकता भी नहीं ली और लंबे समय तक मतदान भी नहीं किया। दूसरा बड़ा विवाद उनके मतदाता सूची में आने को लेकर ही हुआ। 1980 में उनका नाम मतदाता सूची में आ गया, जबकि तब तक उन्होंने इटली की नागरिकता नहीं छोड़ी थी। दूसरी बार जनवरी 1983 में भी ऐसा ही हुआ। कानूनी तौर पर कोई भी विदेशी नागरिक मतदाता नहीं हो सकता है। उन्होंने अप्रैल 1983 में भारत की नागरिकता ली। यानी उन्हें तब तक वे सिर्फ राजीव की संगिनी के रूप में ही देश में रह रही थीं। बाकी बातों से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था। 

1991 में राजीव की हत्या कर दी गई। सभी ने चाहा कि वे उनकी जगह ले लें, लेकिन वे तैयार नहीं हुईं। नतीजा पी.वी. नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने। 1996 में कांग्रेस हारी और गर्त में जाने लगीं। तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी के खिलाफ पी चिदम्बरम, माधवराव सिंधिया, अर्जुनसिंह, राजेश पायलेट, ममता बैनर्जी सहित कई दिग्गजों ने मोर्चा खोल दिया। तब 1997 में सोनिया ने कलकत्ता के प्लेनरी सेशन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ली और1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनी। 1999 में सुषमा स्वराज को हराकर संसद में आईं और विपक्ष की नेता चुनी गईं। 

शरद पंवार, तारीक अनवर, पीए संगमा सहित कई नेताओं ने विदेशी मूल का मुद्दा उठाया तो  उन्होंने इस्तीफे की पेशकश कर दी। इससे उन्हें जबरदस्त जनसमर्थन मिला। अटल सरकार के इंडिया शाइनिंग के जवाब में आम आदमी को खड़ा किया। 2004 में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई। पूरा मौका था कि वे प्रधानमंत्री बनतीं, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। 2009 में तमाम अटकलों को दरकिनार करते हुए यूपीए फिर सरकार में आई। हालांकि मोदी की आंधी में वे हेटट्रिक नहीं बना पाईं। 



उनकी रोमन लिपि में लिखी गई हिंदी, भाषण पढऩे का अंदाज, पुत्र प्रेम , यूपीए कार्यकाल के दौरान मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश न लगा पाने जैसे कई मसलों पर उनकी आलोचना की जाती रही है। लाभ के दो पदों पर होने के कारण संसद की सदस्यता छोडऩा पड़ी, बोफोर्स के दौरान भी उन पर लांछन लगा, क्योंकि क्वात्रोचि इटली का था और यह माना गया कि उसे सोनिया की वजह से प्रधानमंत्री आवास में इंट्री मिली थी। स्वामी उन्हें वैश्या तक कह चुके। बावजूद इसके उन्होंने कभी संयम नहीं खोया। 

तीन बार फोर्ब्स की शक्तिशाली महिलाओं की सूची में तीसरे, छठे और नौवें नंबर पर रहीं। टाइम ने 100 सशक्त महिलाओं में शामिल किया। स्टेट्समैन ने 50 प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया। और जब कांग्रेस फिर एक कुंहासे से घिरती नजर आई, उन्होंने नए नेतृत्व के लिए राह खोल दी। 

एक घरेलू महिला से देश की सबसे शक्तिशाली महिला का शीर्ष छुने के बाद उनका सफर अब नए पड़ाव पर है। वे देश की घरेलू महिलाओं के लिए एक अलग तरह की मिसाल हो सकती हैं कि जब वह सोच-समझकर कदम उठाती है तो राजनीति जैसे क्षेत्र में भी एक नया वितान रच देती है। अच्छे-बुरे को लेकर सबके अपने विचार हो सकते हैं।




By - अमित मंडलोई

Comments