मुंबई लोकल ट्रेन में चढ़ने से पहले ये पढ़ ले।



मुंबई क्या है भागता हुआ शहर या सपनो के लिए भागता हुआ शहर। क्योंकि इस शहर में जो कोई भी आता है अपने सपनों को पूरा करने के लिए आता है। और लोग अपने सपनों को सच करने के लिए इतने मशरूम हो जाते है कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि उनके आस पास कौन हैं।

सपनों के लिए भागते हुए शहर में सपनोँ के मुसाफ़िरो को अपने मंज़िल तक पहुचाती है मुंबई लोकल। ये भी भागती है पर ये अलग बात है कि इसकी कोई मंज़िल नहीं होती। ये आपकी अच्छी साथी बन कर आपकी मदद करती है।

मुंबई में लोग आस - पास के इलाके से 2 घंटे या उससे भी ज्यादा का सफर तय कर के आते है इतना ही नहीं लोग यहाँ देश के अलग - अलग राज्यों से भी आते है। 

अगर आप मुंबई में हो और आपने लोकल में चढ़ना नहीं सीखा तो दरअसल आपने मुंबई से जाते - जाते कुछ नहीं सीखा।

तो चलिए जानते कि मुंबई लोकल में चढ़ते कैसे है ?

सबसे पहले आपको फुर्तीला - चुस्तिला दोनों होना चाहिए अगर आप में ये खूबी नहीं है  तो आप ये भूल जाओ की आप लोकल में चढ़ भी पाओगे। जो आप चढ़ गए तो आपको लगेगा कि आपने सर्जिकल स्ट्राइक लड़ ली है। यहाँ पर तो बूढ़े बुजुर्ग भी एक दम दगड़ाक घोड़े के तरह होते है।

मुंबई लोकल में सीट पाने का दो ही तरीका है एक तो आपको मीडियम से थोड़े धीमे चलती लोकल को झपट्टा मार पकड़ लेना है या फिर जिस स्टेशन से ट्रेन छूटने वाली है वहाँ से ट्रेन पकड़ लो। अगर आपसे ये भी नहीं हो पाता है तो आपको ट्रैन के अंदर घुसने के बाद दो सीटों के बीच मे बचे हुए जगह में लाइन लगाना होगा ताकि अगर कोई उठे तो आपका नंबर लग सके।

मुंबई लोकल और बैग को आगे टाँगना

लोकल ट्रैन को लेकर बहुत बातें सिखना जरूरी है। जैसे कि ट्रैन में चढ़ते वक्त बैग को आगे क्यों टाँगना। मैंने लोकल लोगो से सुना है कि बैग आगे टांगने से आप ट्रैन में आसानी से चढ़ सकते हो। इसकी दूसरी वजह ये भी है कि ट्रैन में भीड़ एक साथ चढ़ती है ऐसे में अगर आपने अपना बैग आपने पीछे टांग रखा है तो कोई न कोई आपको पीछे खींच लेगा फिर आपकी सारी मेहनत बेकार। बैग के साथ - साथ आपको अपने वॉलेट और मोबाइल का भी ख्याल रखना होता है वरना जेब कटवो का शिकार हो सकते हो। इसलिए बहेतर यही है कि लोकल में चढ़ते वक़्त अपने मोबाइल और वॉलेट को बैग में डाल लें। ये बातें जनहित में जारी है।

मुंबई लोकल के हर डिब्बे में एक परिवार होता है।

मुंबई जैसे भागते शहर में उससे भी ज्यादा तेज भागते लोकल ट्रैन में एक परिवार को जन्मे देखना यकीन नहीं होता है लेकिन आंखों को जरूर सुकून दे जाता है।  यू तो  मुंबई की लोकल ट्रैन मुंबई के लोगो का जनजीवन हैं लेकिन फिर भी इन ही ट्रेनों में हर रोज एक नया परिवार जन्म लेता है। 



मुंबई लोकल में 12 डिब्बे होते है कभी कभार 15 डिब्बे भी हो जाते है। अगर आप मुंबई लोकल में नए हो तो आपको हर एक डिब्बे में कुछ लोगों का ग्रुप दिखेगा जिसमे हर जाति धर्म और रंग रूप के लोग होते है। इनमें कोई सीनियर या जूनियर नहीं होता है और ना ही कोई लीडर होता है। और यकीन मानो तो उन सभी का वो परिवार है क्योंकि ग्रुप का हर  मेंबर हर दिन के हिसाब से ग्रुप के बाकी मेंबर्स के लिए वड़ा पाव, समोसा, इडली ऐसी कोई खाने का चीज़ लाता है इतना नहीं ये लोग फ़िल्मी जोक मार कर  हँसी के ठहाके भी लगाते हैं। ग्रुप में हर मेंबर्स को सम्मना दिया जाता हैं। दशहरा, ईद जैसे और भी त्यौहार ये ग्रुप लोकल ट्रैन में ही मनाते है। इस हिसाब से ये ग्रुप घर से निकलने के बाद ट्रेन में बनने वाले परिवार है।

अब आप सोच रहे होंगे कि ये ग्रुप्स बनते कैसे है ? देखिए मुंबई लोकल के परिवार का हिस्सा होने के लिए कोई एग्जाम या कोई कास्ट सर्टिफिकेट देने की जरूरत नहीं है। सिर्फ एक फार्मूला है उसे फॉलो करना होगा। डेली एक ही ट्रैन और एक ही डिब्बा पकड़ना होगा। उसमें भी कल आप जहाँ खड़े थे उसी जगह खड़ा होना होगा। ये क्रिया आपको लगातार एक हफ्ते तक करनी होगी जिससे आपके आस पास के लोग आपको पहचानने लगगे फिर आपको खुद ही काका मामा भाई कर के बात करने की कोशिश करनी होगी फिर धीरे धीरे बातों का सिलसिला आगे बढ़ेगा फिर एक दिन आप भी ग्रुप के लिए नास्ता लेकर आते दिखोगे। 

मुंबई लोकल और भजन।

मुंबई लोकल के हर डिब्बे और हर ट्रैन में ये जरूरी नहीं है कि आपको भजन और कीर्तन सुनने को मिलेगा क्योंकि भजन और कीर्तन के बहुत कम ही गिरोह मुंबई लोकल में सक्रिय है।



दरसअल जिस तरह से मुंबई लोकल में परिवार होते है उसी तरह कुछ - कुछ लोकल में आपको भजन कीर्तन वाले ग्रुप भी दिखेंगे। ये भी हमारी और आपकी तरह घर से सुबह दफ्तर जाने के लिए निकलते है। लेकिन ये आपको ट्रैन में लाइव भजन देखने का मौका देते है। ये 4 -5 लोग होते है जो लगातार एक घंटे तक ट्रैन की खिड़की और ताशा बजा कर भजन गाते रहते है। इनकी आवाज़ बहुत कमाल की होती है हालांकि युवा वर्ग इनसे बहुत खफा होता है जिस वजह से वो अपने कान में एअर फोन ही नहीं ठुसते है। लेकिन वहीँ ट्रैन में कुछ यात्री ऐसे भी होते है जो भजन और कीर्तन को सुनना पसंद करते है। ट्रैन में भजन और कीर्तन प्रायः हिंदी और मराठी में होते है।

इसके अलावा मुंबई लोकल में गेट पर खड़े होने के दौरान आपको अपना मोबाइल फोन जेब मे रखना होगा वरना स्टेशन पर झप्पटा मारने वालों की कमी नहीं हैं। आपकी इस असावधानी की वजह से आप दुखी और चोर खुश हो सकता है।

मुंबई लोकल में रोजाना लाखों जंग खाये हुए चेहरे सफर करते है जिनके कंधे किसी न किसी जिम्मेदारी से लदे होते है। इसलिए मुंबई लोकल पर लिखी  एक छोटी सी कविता के साथ चलता मुझे दे को इज्जात...

एक नीरस वादा रोज निभाता हूँ।
मैं खुद से ही अपनी इच्छा छिपता हूँ।
उम्मीदों के आलीशान मकानों को
रोज बनाता हूँ पर जिम्मेदारियों की आड़ में  लोकल चढ़  उसे ढहता हूँ।
भीड़ चाहे कितनी भी हो
मैं जिम्मेदारी की चादर ओढ़ चढ़ जाता हूँ।
उसकी मर्जी है वो वक्त से ज्यादा नहीँ रुकती
मेरी भी जिद है मैं वक्त से पहले उसका इंतज़ार करता हूँ।
एक नीरस वादा रोज निभाता हूँ।
मैं खुद से ही अपनी इच्छा छिपता हूँ।




By - सूरज मौर्या



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