मैं जा रहा हूँ अपने देश।



कभी एक दिन मैं आया था परदेश
लेकिन बहुत रह लिया यहाँ,
अब मैं जा रहा हूँ अपने देश

इस शहर की बात करू जो मैं
बाजार में जब यहाँ शोर मचता है,
भरे बाजार में किसी का ज़मीर बिकता है
यहाँ नही आता इतवार कभी भी,
यहाँ तो हर रोज मंडे होता है

अमीरी का रुतबा भी कुछ ऐसा है यहाँ
कोई हर रोज बिस्तर बदल लेता है
वही ग़रीबी की भी ऐसी मिसाल है यहाँ
सोने को फुटपाथ भी नसीब नही होता है

कुछ किस्मत का भी जोर चलता हैं यहाँ
कोई फ़क़ीर से अमीर बन जाता है
वही किसी का अमीरी का महल,
ताश के पत्तो की तरह बिखर जाता है

हवा में विष घोल रही है,
ये चलती गाड़ियाँ ये कारखाने
कोई यहाँ भीड़ में ख़ास रहा है,
बेकार बीमारियों का बोझ बढ़ा रहा है
माना यहाँ डॉक्टरों की कमी नहीं,
पर हमें ठीक कर दे, इनमें इतना दम नही

जब आया तो सबकुछ ठीक था,
मेरे इस शरीर का हाल
लेकिन अब मैं ठीक कहने जैसा न रहा
बहुत कुछ है यहाँ पाने को,
लेकिन मेरे पास नही कुछ खोने को
इसलिए मैं जा रहा हूँ अपने देश

मेरे गाँव की आबो हवा में कुछ खास है
या ये सिर्फ मेरे मन के विचार है
जो भी है, ये बात तो तय है,
जब-जब शहरी हवा मुझे बीमार करती है
मेरे गाँव की हवा मेरा ईलाज करती है
इसलिए मैं जा रहा हूँ अपने देश

पैसा कमाने आया था कभी मैं भी,
अपने गाँव की वो गलियां छोड़कर
लेकिन अब पता चला है जो मुझे,
पैसा ही नही जिस्म भी ज़रूरी है
अब इसी जिस्म की मरम्मत करने
मैं फिर जा रहा हूँ अपने देश

मेरे गाँव की कुछ अलग बात है
वो मेरे लिए स्वर्ग सा आभास है
वहाँ के नीम हकीम भी बड़े उस्ताद है
कुछ ऐसी उनमे अनोखी बात है
शक्ल देख बीमारी बता देते है
देखते देखते ईलाज भी कर देते है
मुझे ठीक कर सकते है अब वही
यही सोचकर, मैं जा रहा हूँ अपने देश




By - Hitesh kumar

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