भीतर कोई बंद है।




''अरे वाह आज तो बिल्कुल हूर लग रही हो काकुल --बहुत दिनों बाद इतना सजा सँवरा देखा है मैने अपनी बिट्टो को ---।'' काकुल की माँ ने काकुल का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा तो काकुल मुस्करा भर दी।

''आज तो दीदी रेस्टोरेंट में जाकर मनायेन्गे आपका जन्मदिन जैसे कि आपकी शादी से पहले मनाते थे--न --।'' कुशल ,काकुल के भाई ने खुशी से उछलते हुए कहा।

''हाँ -और आज तुम्हारे पापा भी जल्दी घर आ जायेन्गे औफिस से ---।'' काकुल की माँ सुनीता ने सोफे पर पडे कपडो को उठाते हुए कहा।

''नाना जी भी आ जायेन्गे --!'' काकुल की चार साल की प्यारी सी बेटी तोतल ने खुश होते हुए कहा।

''हाँ बेटा ---नाना भी आ जायेन्गे --फिर हम सब खूब सारी शपिंग करेंगे --और फिर तुम्हारी मम्मी का बर्थडे मनायेन्गे ---।'' सुनीता ने अपनी नातिन को गोदी में उठाते हुए कहा।

''मम्मी --मम्मी मेरे पापा भी आयेन्गे न ---!'' मासूम सी तोतल ने अपनी माँ काकुल से लिपटते हुए कहा तो सब एक -दूसरे का मुँह देखने लगे।

'नहीं ----सुनीता ने कहना चाहा ,परंतु काकुल ने इशारे से उनको बोलने से रोक दिया।

''हाँ --बेटा --पापा भी आते --लेकिन वह बाहर गये हुए हैं न --इसलिये --नहीं ---!''

''आप तो रोज ऐसे ही कहती हो ---चलो ठीक है -- कल को आजायेन्गे ---।'' तोतल ने अपनी माँ की बात को बीच में ही काटते हुए कहा और खुद को समझा भी लिया।

काकुल का ह्र्दय भर आया। ऐसा लगा मानो किसी ने कितना बोझ लाद दिया है दिल पर अंदर ही अंदर कुछ टूटा और -- और कुछ खाली सा कुछ अधूरा सा लग रहा था उसको वह तड़प उठी एकदम टेबल पर रखा मोबाइल उठाया --लेकिन उसको याद आया कि  जब पिछली बार वह अपनी ससुराल को छोडकर आई थी तब अपने पति लोकेश का नम्बर भी डिलीट कर दिया था।

उसने ---कितना रोक था लोकेश ने --परंतु --परंतु उस पर तो जैसे घर छोडने का भूत सवार हो गया था उसको लगता था कि शादी के बाद जैसे उसकी आजादी छिन सी गयी है। फिर --फिर आज यही आजादी चुभ सी क्यों रही है ? क्यों लग रहा है कि कोई अपना उसको टोके --रोके -- कभी डाँटे -- तो -- तो कभी प्रेम जताये --यूँ तो खुश रहने का वह बहुत नाटक करती। 

परंतु फिर भी लोकेश के साथ गुजारे लम्हों को वह भुला नहीं पा रही थी ऐसा लगता जैसे कि -लोकेश --उसका घर --रिश्ते -नाते सब कुछ --उनकी यादें --बातें सब से उसका दिल भरा पडा है। जैसे कि अंदर कोई बंद हो...

''माँ मुझे मेरे घर जाना है ---जो भी गिले-शिकवे हम-दोनों के बीच थे उनको दूर करना है --अपनी बेटी और खुद के जीवन में --भरा अधूरापन मन का यह भारीपन मुझे दूर करना है।'' बेटी की बातें सुनकर सुनीता की आँखैं भर आईं  उसको सीने से लगा लिया  --बेटी का संसार उजड़ने से जो बच गया था।



By - राशि सिंह 




नोट - इस कहानी में कोई मात्राओं की शिकायत न करें।

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