ठिठुरते दिन को यादों को काढ़ा।



सुबह आंख खुली तो देखा मियां सूरज खुद कोहरे के लिहाफ में दुबके बैठे हैं। उनींदा दिन अधूरी रोशनी के साथ कदम बढ़ा रहा है। एक-एक कदम वह आगे बढ़ाता, लेकिन फिर भी ठहरा सा लग रहा है। वैसे जैसे कोई कली गुलाब की आहिस्ता-आहिस्ता खिलती है। दिन ठंड के आगोश से ऐसे ही बाहर आता है। घड़ी की सुइयां भागती है, लेकिन वक्त नारियल के तेल की तरह जम गया है। चलते वक्त उसके हाथ भी आगे-पीछे नहीं होते। भींच लिया है उसने उन्हें, घडिय़ालों की जेब में रख लिया है। 

मैंने दिन के कुर्ते की जेब में हाथ डाला तो देखा यादों की कई पुडिय़ां खुली बैठी हैं। किसी पुडिय़ा में कोई आंगन नजर आता है। जहां बैठी है कुछ अपनों की टोली। दोपहर की गुनगुनी धूप में कोई थाली में मटर छिल रही हैं तो कहीं सलाइयों पर ऊन के रेशों से किसी के लिए गर्माहट बुनी जा रही है। किसी घर से चाय की खुशबू उड़ती है तो कहीं से पकौड़ों की महक सर्द हवाओं के पेट में चटपटाहट  घोल देती है। दूर किसी छत पर खाट डाले बैठी दादी, पोती के सिर पर सरसों का तेल मल रही है। कभी खींचती है, कभी भींचती है, ये चोटी है कि रिश्तों को अपने भीतर समेट लेती है। उसी टोली के पास फुदकते हैं बच्चे, कभी नाक पोंछते कभी खांसते, लेकिन जीभर कर खिलखिलाते, ठहाके लगाते। 

सुबह ब्रश के लिए किटकिटाते दांतों का संगीत, चुल्हे पर उबलते पानी से निकलते धुएं में जिंदगी भर देता है। रजाइयों से झांकते चेहरे, शरारतों की नई-नई इबारत लिखते हैं। किसी पर पानी की दो बूंद छिडक़ते हैं, किसी के हाथ में हौले से बर्फ का एक टुकड़ा रख देते हैं। हवाओं की शैतानियों से लाल हुई नाक पर एक बौसा रखते ही, रोम-रोम सितार हो उठता है। 



एक पुडिय़ा से बाहर निकल आती है एक बुढिय़ा, जिसने बनाए होंगे ठंड से लडऩे के अनगिनत नुस्खे। कभी वह पत्थर पर सौंठ घिसती है, कभी रात से भिगोए खसखस और बादाम को घी में डालकर उसका हलवा करती है।  बुढिय़ा को नींद नहीं आती वह जागती रहती है, सोचती रहती है। सिलबट्टे पर लहसुन-अदरक पीसती है, मोटे अनाज के टिक्कड़ सेंकती है। हर घर में वही बुढिय़ा मां, बहन, बेटी, बीवी बनकर जन्मती है। पूरे कुनबे को स्नेह की गर्माहट देकर सर्द लहरों से बचाती है। फिर भी यह बात समझ नहीं आती है कि आखिर खुद उसे ठंड क्यों नहीं लगती है। 

सामने चबूतरे पर स्कूल नजर आता है। धूप के साए में बैठे हैं, बच्चे। टीचर उन्हें क, ख, ग पढ़ाते हैं। बच्चे जोर से पढ़ते हैं, पन्नों के पलटने से निकलती हवा से भी सहमते हैं। आसपास से गुजरने वाली आंखें जब झांकती हैं तो मौसम की बगिया में नन्हे फूल खिलखिला उठते हैं। होमवर्क कोई पूछता नहीं, ये बताते नहीं। जितना पढ़ाया पढ़ लिया, जितना रह गया वह हवाओं के हवाले कर दिया। 

टोपी, स्वेटर, शाल और दस्ताने, इनके पास भी तो हैं कहने को कई अफसाने। ये टोपी मौसी ने बनाकर भेजी थी। इस स्वेटर पर लगे फूल की डिजाइन के लिए कितनी सरिता पलटी थी। किसके लिए कम पड़ गया था लाल रंग का चटकीला ऊन। कितनी जद्दोजहद के बाद मिले थे वर्धमान के वे दो गोले। पश्मिना के नाम पर ली गई पतली सी शाल ठंड भले उतनी नहीं रोकती, पर हर बार यादों के समुंदर में जाल डालकर बैठ जाती है। जिंदा रिश्तों के अहसासों की गर्मी के आगे ठंडी हवाओं का जोर नहीं चलता। 


फिर बालकनी से नजर आते हैं वे दो जोड़ी हाथ। कभी एक-दूसरे पर नाचते हुए कभी सीने से चिपटकर सांसों की गर्माहट छकते हुए। कोई उन्हें देखता है, फिर मुंह नीचे कर लेता है। बार-बार यही होता है और इन पलों में चौदहवीं का चांद  भी सूरज की गर्माहट ओढ़ लेता है। एक बार नजर मिलते ही सारी ठंड उड़ा देता है। कॉपियों के आखिरी पन्ने पर नई तस्वीर बनकर उभर जाता है। 

यादों का काढ़ा देर तक ऐसे ही मुझको गरम रखता है। मेरे हाथ पर कई जोड़ी हाथ रखता है। मैं उन सबकी गर्माहट याद करता हूं। फिर बाहर झांक कर देखता हूं तो कुछ निराश होता हूं। वही ठंड अब वैसे ही चंद लम्हों के लिए तरसती नजर आती है। रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच जब मुश्किल से पनाह पाती है। दुआ करता हूं हर सर्द हवा से वह हर बरस चाय की प्याली और पकौड़ों की लज्जत के साथ यादों का शामियाना भी ताने रहे।





By - अमित मंडलोई

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