इज्जत इनकी नहीं कानून व्यवस्था की उतरी है।



सीबीआई ने 2 जी घोटाले के सभी 19 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। 

कोर्ट के सामने केस साबित करने में विफल सीबीआई ने इन्हें तो बचा लिया, लेकिन इस फैसले ने कानून व्यवस्था की इज्जत जरूर उतार दी है। 

यह साबित करता है कि सबूतों की बैसाखियों के मोहताज कानून के साथ कितनी आसानी से खेला जा सकता है। 

फैसले से फुले नहीं समा रही कांग्रेस सार्वभौमिक रस्म निभाते हुए मीडिया को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है कि बिना वजह इतना ढोल बजाया गया। कैग विनोद राय से माफी मांगने की सिब्बली फरमाइश भी की गई है। इसे झूठ का घोटाला कहा जा रहा है। 

सच में हंसी आती है कि सीबीआई जांच एजेंसी है, तोता है या फिर पोगापंडितों की जमात। जिसके पास सिर्फ दो ही काम है। एक मामले को इतना लटकाना कि लोगों को स्मृति लोप हो जाए और उसके बाद कुछ भी साबित न कर पाना। आश्चर्य होता है कि नीरा राडिया की जिन टेप ने पूरे देश में खलबली मचा दी थी, उन टेप का हुआ क्या। क्या वे भी किसी भरोसेमंद लैब में भेज कर अडल्टरेट साबित कर दी गईं, या उन्हें इतने हल्के से पेश किया गया कि अदालत को वे पर्याप्त नहीं लगीं। 

फिर मामले में गवाहों के रूप में जो भारी-भरकम लोग पेश किए गए उनका क्या हुआ। नीरा राडिया मामले में खुद एक गवाह थीं। एम करुणानिधि की पत्नी दयालु करुणानिधि, अनिल अंबानी सपत्निक मामले के गवाह थे। इनके अलावा आरबीआई के पूर्व गर्वनर डॉ. सुब्बाराव, कानून सचिव टीके विश्वनाथ , पूर्व दूरसंचार सचिव डीएस माथुर, ट्राई के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा और पूर्व अटार्नी जनरल जीई वाहनमति भी गवाहों की फेहरिस्त में शामिल थे। इतने संभ्रात, प्रतिष्ठित और जिम्मेदार लोग भी क्या घोटाले के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए, जिसे अदालत सबूत मान पाती। 



या फिर वही सही है, जो कांग्रेस कह रही है कि जनाब वास्तव में कोई घोटाला हुआ ही नहीं है। यह तो कैग विनोद राय की साजिश थी, उन्होंने अनुमानों के आधार पर 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए के घोटाले की स्क्रिप्ट लिख डाली। जबकि कांग्रेस ने तो स्पेक्ट्रम आवंटन में पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की पहले आओ, पहले पाओ वाली नीति का ही अनुसरण किया है। इनके इस भोलेपन पर क्या आपको तरस नहीं आता है। एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोसने वाले ये दल कैसे जरा सा शेल्टर मिलने पर गिरेबानों में दुबक जाते हैं। 

हुजुर वैसे तो सरकार बदलते ही आप पहले पुरानी सरकार की सारी रीति-नीति को गड्ढे में डालकर नई घोड़ी नया दाम करते हैं, फिर इस मामले में कैसे चूक गए। या दिमाग में वही था कि एनडीए सरकार ने स्पेक्ट्रम आवंटन में मलाई खाई है तो अब मुफ्त के इस मक्खन को कैसे छोड़ दें। अगर आपके मन में खोट नहीं थी तो फिर नीलामी से स्पेक्ट्रक्म क्यों नहीं दिए गए। और मान लिया कि यह विनोद राय का अनुमान ही था कि अगर ये स्पेक्ट्रम नीलाम किए गए होते तो देश को 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए ज्यादा मिलते। इस अनुमान में विनोद राय गलत कहां है। आपने भी तो हौले से स्वान टेलीकॉम, लूप टेलीकॉम, एस्सार, एडीए रिलायंस ग्रुप और यूनिटेक को उपकृत कर दिया। अगर सच में फेयर गेम खेलना चाहते थे तो फिर नीलामी से क्यों हाथ खींच लिए। 


कनिमोझी और ए राजा का लड्डू बांटना समझ आता है। कोई भी छात्र एक बार फेल होने के बाद रिवेल्युएशन में पास होता है तो उसकी दोगुना खुशियों का राज समझ में आता है, लेकिन कांग्रेस किस आधार पर खुद को कैरेक्टर सर्टिफिकेट दे रही है। ये कांग्रेसी तब कहां गए थे जब ए राजा ने कहा था कि जो कुछ हुआ था वह सब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की जानकारी में था। अब सब न्याय की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन इतनी आसान सी बात समझना क्यों नहीं चाहते कि भाई इतने ही पाक-साफ थे तो फिर डीबी रियल्टी को कनिमोझी की कलाइंगनर टीवी को 200 करोड़ रुपए की रिश्वत देने की नौबत क्यों आई थी। राडिया के टैप में जो कुछ देश ने सुना क्या वह किसी ड्रामे की स्क्रिप्ट थी। उसका वाइस ओवर चल रहा था। 

कहते हैं कि न्याय की देवी की आंख पर पट्टी इसलिए बांधी गई है, ताकि वे अपने-पराए में भेद न कर सके। लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसकी खोज देवी को अन्याय के स्याह कूप में रखने के लिए की गई थी। अंधियारे में बैठी देवी के समक्ष सिर्फ वही साबित हो पाए, जिसे ये साबित करना चाहे। बाकि बोफोर्स से लेकर व्यापमं तक कितने घोटाले साबित हो पाए हैं, देश अच्छे से जानता है।




By - अमित मंडलोई

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