यौम ए पैदाइश मुबारक हो असद।






आज एक शख़्स की यौम ए पैदाइश है। जिसके बिना उर्दू  लफ्ज़ वैसे ही जैसे आँखे बिना सुरमे वाली। आज दिन है उस शख़्स का जिसने दुनिया को मजबूर कर दिया शायरी की तरफ़ झुकने के लिए।  मिर्ज़ा असद-उल्ला खां उर्फ़ 'मिर्ज़ा नौशा' उर्फ़ "ग़ालिब"। मुझे याद है मैं दसवीं में था जब इस नाम से रू ब रू हूँ । तब बाकि बच्चों के जैसे मैंने भी हँस के ये कहा था "क्या फिसूल की चीज़ें हैं ये सब"एक और चीज़ होती है कि हम जिसको एक बार ना बोल देते हैं उसके लिए हमारे मन में वैसे ही ख़यालात पैदा हो जाते हैं। हुआ भी वही। जब शायरी की तरफ़ मेरा झुकाव बढ़ा तब मैंने भी पढ़ना शुरू किया सबको सिवाय ग़ालिब के। क्यों ? क्यों कि जिसे भी देखो ग़ालिब ग़ालिब की रट लगा कि बैठा था। यार ग़ालिब हो गए हो क्या ? और ऐसे ऐसे लोग ग़ालिब के नाम की धज्जियां उड़ा रहे थें जिनका अशआर से, ग़ज़ल से दूर दूर तक कोई राब्ता नहीं था। तो मुझे भी लगा कि जब ऐसे ऐसे लोग इस बन्दे की बात कर रहे हैं तो क्या लिखा होगा इसने। फिर एक अशआर पढ़ा कहीं - 

ग़ालिब-ए-खस्ता के बगैर कौन से काम हैं
रोइये  ज़ार-ज़ार क्या, कीजिये  हाय-हाय क्यूँ

रोंगटे खड़े हो गएँ उस रोज़ कि कोई बंदा इतना सच्चा कैसे हो सकता है। सच ही तो लिखा कौन सा मरने के बाद कुछ होना या जाना है जो जैसा चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा तो ये झूठे दिलासे ये चीखना चिल्लाना किस लिए। तब लगा नहीं कुछ तो ग़लत है इनको पढ़ना चहिये। ये शख़्स इतना आसान तो नहीं है जितना लोग दिखा रहे हैं या जितनी आसानी से नाम ज़ुबान पे रौंद दे रहे हैं। वरना ग़ालिब की तहज़ीब का अंदाज़ा इस शेर से लगाया जा सकता है -
   
   हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
   तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है 

सच कहूं तो इश्क़ होने लगा मुझे महज़ कुछ महीने ग़ालिब के साथ गुज़ारने के बाद। एक बात तो है शायर बन सकता है सब कोई ग़ालिब कोई नहीं बन सकता। उनका अंदाज़, उनके अशआर जितना रुआब उतनी ही मासूमियत, मोहब्बत लफ्ज़ भी ग़ालिब के बिना अधूरा लगने लगे।

हैं  और  भी  दुनिया  में  सुख़न-वर बहुत अच्छे कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

शायरी आसान लगने लगती जब हमें समझ आने लगती लेकिन शायरी मोहब्बत तब लगती जब एक एक अशआर से जूंझना पड़े कि आख़िर किस लिए ये लाइन लिखी गयी किसके लिए लिखी गयी और क्यूँ लिखी गयी ? मोहब्बत में इंसान ज़्यादा बोल नहीं पाता शायद कम अल्फ़ाज़ों में अपनी बात पूरी करने के लिए बनी है शायरी की दुनिया। 

और इस दुनिया के सबसे तेज़ चमकने वाले सितारे का नाम है "असद"

आख़िरी शेर -

पूछते  हैं  वो कि  'ग़ालिब'  कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या 




By - सूरज सरस्वती



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