बस नजीर न बने गुजरात।


गुजरात के नतीजों ने किसी और को न सही लेकिन देश के लोकतंत्र को जरूर आईना दिखा दिया है। गुजरात में बीजेपी की जीत और कांग्रेस की बढ़त में कई संदेश छुपे हैं, सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं वे नजीर न बन जाएं। वरना मतदाताओं के सरोकारों को ऐसे ही दरकिनार कर राजनीतिक ड्रामेबाजी से ही उन्हें हांका जाने लगेगा। सरकार और विपक्ष दोनों इस खुशफहमी में न आ जाएं कि पांच साल कुछ भी कीजिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बस प्रचार में ताकत झोंक दीजिए, सब हो जाएगा। 

गुजरात में बढ़त से कांग्रेस कहीं देश की राजनीति को दशकों पीछे न धकेल दे। बिहार का जातिगत राजनीति वाला मॉडल सब जगह न लागू कर दे। यह संदेश न जाए कि सांप्रदायिकता या धार्मिक धु्रवीकरण का जवाब जातीय समीकरणों से दिया जा सकता है। आरक्षण की आग भडक़ाकर, बड़ी जातियों के नेताओं को पक्ष में करके रिपोर्ट कार्ड सुधारा जा सकता है। क्योंकि अगर ऐसा हुआ केंद्र तो दूर मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ही जातियों के बीच तलवारें खींच जाएंगी। वैमनस्यता का बीज लोकतंत्र की जड़ें खोखली करने लगेगा। 

कांग्रेस यह भी न समझे कि सिर्फ मंदिर जाकर ही मतदाताओं का दिल जीता जा सकता है। ये न मान लें कि धार्मिकता को लेकर विरोधाभास खड़ा होने पर उतनी ही आक्रामकता से उसका जवाब दिया जाना चाहिए। कोई धर्म पर सवाल खड़े करे तो आप उसके पीछे जनेरू का शस्त्र लेकर दौड़ जाइये। अपनी शिव भक्ति की मिसाल रखिए। धर्मास्त्र को धर्मास्त्र से ही परास्त कीजिए। आक्रामक हिंदुत्व के जवाब में सॉफ्ट हिंदुत्व ले आइये। बाकी मुद्दों का क्या है, उन पर बात करने के लिए तो और भी वक्त मिलेगा। अभी तो मुद्दों की काट कीजिए। 


साथ ही कांग्रेस के दिग्गजों को यह भी सीखना होगा कि चाहे कुछ भी हो जाए भाषाई मर्यादा का परित्याग हानिकारक है। मुद्दों पर जमकर बहस कीजिए, तर्क रखिए, सामने वाले को गलत साबित करके दिखाइये। किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है, लेकिन किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप मत लगाइये, उसे छोटा साबित करने के लिए आप और छोटे मत हो जाइये। गुजराती मीठा खाते और मीठा ही बोलना पसंद करते हैं, वहां अपशब्दों का कोई स्थान नहीं है। 

फिर भाजपा के लिए तो यह जीत अलर्ट कॉल की तरह है। उन्हें भी कुछ खुशफहमियों से बाहर आना होगा। खासकर सियासी शोशेबाजी से कि 22 साल तक विकास, वाइब्र्रेंट गुजरात का दम भरो और चुनाव में आकर फिर वही हिंदू-मुस्लमान करने लगो। डर इसी बात का है कि अगर गुजरात में भी वे अपने पारंपरिक हथियार से ही जीत रहे हैं तो वे बाकी सबको तिलांजलि देकर उसी एजेंडे पर न लौट आएं। 

वे कहीं ये न समझें कि जीएसटी, नोटबंदी सहित तमाम फैसले भी इस चुनाव के साथ जस्टीफाइ हो गए हैं। सूरत का विरोध अगर वोट में नहीं बदल पाया है तो उसके कई ज्ञात-अज्ञात कारण हो सकते हैं। इसका मतलब ये न निकाला जाए कि आप कुछ भी करो, चुनाव के पहले राहत का थोड़ा सा झुनझुना पकड़ाओ तो सब ठीक हो जाता है। यह संदेश न जाए कि सारा अच्छा-बुरा चुनाव जीतने के साथ ही सेट हो जाता है और फिर से मनमानी का लाइसेंस मिल जाता है।



डर यह भी है कि ये न समझा जाए कि किसी के पुरखों का निरादर करके उनकी पुरानी गलतियां निकाल कर मौजूदा पीढ़ी को भरमाया जा सकता है। नाक पर रूमाल और पटेल के साथ अन्याय के जुमले सहानुभूति बंटारने में मदद करते हैं। ये न समझें कि मुद्दों को दरकिनार कर सिर्फ विरोधियों पर राजनीतिक कटाक्ष करके भी बाजी जीती जा सकती है। जीतने के लिए जितना दम लगाना पड़ा है वही बताता है कि सबकुछ वैसा नहीं हुआ है जैसा सोचा गया था। ज्यादातर सीटों पर जीत का अंतर ज्यादा नहीं है। 

भाजपा लोकतंत्र पर एक अहसान और कर सकती है कि वह इसे भी नजीर की तरह इस्तेमाल न करे कि तमाम विरोध और आलोचनाओं के बावजूद सिर्फ सियासी फायदे के लिए मशीनरी का इस्तेमाल कामयाबी का अहम सूत्र है। हिमाचल के साथ गुजरात के चुनाव न कराने का फैसला राजनीतिक सुझबूझ और चतुराई का नमूना हो सकता है, लेकिन मतदान के पहले मतगणना की तारीख तय करना सत्ता का दुरुपयोग ही कहा जाएगा।  

देश के लोकतंत्र की अहम कड़ी होने के नाते हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे सियासी रहनुमा आने वाले चुनाव में कम से कम इन सियासी चालबाजियों के बजाय हमारे मुद्दों पर बात करेंगे। हमें मेरिट पर फैसला लेने का मौका देंगे। कम भ्रष्ट और थोड़े ठीक के चुनाव की इस सार्वभौमिक विवशता से बाहर निकालने के लिए भी थोड़ा ही सही लेकिन प्रयास जरूर करेंगे। वरना लोकतंत्र का जो हो रहा है वह तो हो ही रहा है।





By - अमित मंडलोई 

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