प्राइम टाइम में बाबरी, आडवाणी और पत्रकारिता।


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आज सुबह फेसबुक की एक पोस्ट में पढ़ा कि बाबरी मस्जिद पर प्राइम टाइम में रवीश कुमार कह रहे हैं कि लालकृष्ण आडवाणी को मस्ज़िद ढहाए जाने का बहुत अफसोस हुआ था, और 19 साल बाद 2011 में उन्होंने इस मुताल्लिक़ अपने उद्गार प्रकट भी किये..आंसू बहाते हुए.

इसी प्रोग्राम में बाबरी के सिलसिले में रवीश ने दो पत्रकारों का नाम भी लिया प्रशंसा के लहजे में इत्तफ़ाक से दोनों के साथ अपना सहकर्म रहा है.

अब थोड़ चिग्गी लेने का मन कर रहा है..छह दिसंबर 1992 को कानपुर से चल कर अल्ल सुबह ही खचड़ा जीप से स्वतंत्र भारत के हम चार फैज़ाबाद पहुंच गए. शहर के एक बेहतरीन होटल में देश दुनिया के पत्रकार कई दिन से पसरे हुए थे. हमारे भी दो-चार बॉसेज टाइप लंगूरे वहीं कयाम किये हुए थे.

यहां एक सच उगल दूँ कि अपन अपने रिस्क पे सिर पे कफ़न बांधे उस दिन अयोध्या जा रहे थे, कुछ हो-हवा जाता तो थापर का पियोनियर संस्थान मूतने भी न आता..क्योंकि अपन बाकायदा प्रधान संपादक घनश्याम पंकज की हुक्मउदूली किये रहे. जिनका आदेश था कि हम कतई न हिलें कानपुर से.

लाल कृष्णा आडवाणी

होटल में घुसे थे कि कोई हम को चाय पिला देगा पर वहाँ मामला गर्म था एक महिला रिपोर्टर को लेकर हुई तक़रार का. आखिर में देर रात जो ज़्यादा मजबूत निकला, वही उन मोहतरमा को ले उड़ा. नर मादा दोनों हमरे संस्थान के ही थे. अपन की आमद अवैध थी, इसलिए आंखें मिलाए बिना अयोध्या निकल लिए.

अयोध्या में एक सुनसान सड़क पर जीप खड़ी कर टीले खाई फांदते हुए कारसेवा स्थल पर पहुंच गए. सैंकड़ो पत्रकार-फोटोकार सांप-नेवले की लड़ाई का बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे थे. मंच पर आडवाणी, जोशी, कटियार, सिंघल, उमा और ऋतम्भरा को एक हज़ार साल की गुलामी की जंज़ीरें टूटने की बेकरारी.

मरहूम सुरेंद्र प्रताप सिंह से दो चार बतियां कर यहां वहां टूलने लगा. बाकी जनों को उनका काम समझा दिया. दस बजते ही माहौल गर्माने लगा. विभिन्न उपकरणों से लैस कारसेवकों के एक जत्थे ने कारसेवा स्थल पर पहुंच तोड़फोड़ शुरू कर दी. वो जगह हल्दीघाटी में तब्दील हो चुकी थी.

वहां से सबसे पहले पत्रकार बिरादरी ने दौड़ लगाई और सब पास के एक भवन की छत पर चढ़ कर पतंग उड़ाने लगे नीचे मुख्य द्वार पर ताला मार कर.

राजीव मित्तल जैसे छोटे मोटे पत्रकार की पैंट एक बार तो गीली होने को हुई लेकिन फिर जुनून को सिर पर फिटफाट कर जंग ए मैदान में कूद पड़ा. मंच पर जयकारा मचा हुआ था. खुशी के मारे कोई न कोई किसी की गोद में कूद रहा. आडवाणी जी ने गुलामी की जंज़ीरें टूटने के उपलक्ष्य में प्रसाद खा कर जाने की मीठी सी अपील की.

इस बीच अपनी जान दो घंटे तक हलक में अटकी रही. मस्ज़िद परिसर के इंच इंच पर तोडताड़ी..धूल गुबार का आलम, वहशी चीखें, शोरगुल..सिर पर भगवा पट्टा बांध और जय श्री राम के नारे लगा कर पूड़ी सब्जी का पैकेट हथियाया और उनमें शामिल हो घूम घूम कर, कंगूरों पर चढ़ कर पत्रकार का धर्म निभाया. मन में यह ठसक तो थी ही कि अपनी बिरादरी जैसा कायर नहीं निकला.

बाद में दो चार जगह पिटते पिटते बचा..फिर कानपुर कैसे पहुंचे. मेस्टन रोड पर बने मिश्रा लॉज में 'पाकिस्तानी इलाके'  से आ रही गोलियों से कैसे बच पाए.. वो छोड़िए.. आफिस में अपनी रिपोर्ट पंकज ने यह कह कर छापने से मना कर दी कि उनके मना करने के बावजूद अयोध्या क्यों गया था.

रिपोर्ट उन की छपी जिन्होंने महिला रिपोर्टर को अंकशायनी बनाने को लेकर उस होटल में सबके सामने एक दूसरे की मां बहन को विभिन्न तरीकों से उच्चारित किया था और यह पूरा वाकया पंकज जी के संज्ञान में था.



By - राजीव मित्तल
( दुनिया की ऐसी - तैसी करने आया पत्रकार )

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