ना जोर चलेगा लाठी का, लालू लाल है माटी का।




चारा घोटाले में जेल पहुंच चुके लालूजी ने आखिरकार सीबीआई को विफलताओं की हेटट्रिक से बचा लिया। लालूजी जेल पहुंच गए हैं और इस बात के लिए इस बिहारी लाल की तारीफ होना ही चाहिए कि वे राजनीति के अकेले ऐसे सूरमा हैं, जिन्होंने अपनों को उपकृत करने से लेकर घोटालों तक किसी काम में कंजूसी नहीं की। रेल मंत्री के रूप में जो काम किया, उसके भी चर्चे हार्वर्ड तक पहुंचे। अपने गंवई अंदाज के लिए मशहूर लालूजी ने जो किया खुलकर और दिल खोलकर किया। आज भी दोषी करार देने के तुरंत बाद ट्वीट किया कि ''ना जोर चलेगा लाठी का, लालू लाल है माटी का।'' 

900 करोड़ रुपए के चारा घोटाले में उन पर छह केस दर्ज हैं। पशुपालन विभाग में हुए इस घोटाले में 20 वर्षों के दौरान पशुओं की दवाई और चारे के नाम पर अरबों रुपए डकारे गए। लालूजी ने दोषियों को न सिर्फ बचाया बल्कि उन्हें नौकरी में एक्सटेंशन भी दिया। वैसे मामले में नेताओं और नौकरशाहों सहित कुल 34 लोग आरोपी थे, जिनमें से 11 की मौत हो चुकी है और एक अपराध कबूल कर चुका। 6 लोग आज बरी कर दिए गए और बाकी को सजा हो गई। ये भी अजीब इत्तेफाक है कि घोटाला पशुपालन विभाग में हुआ है और कभी खुद लालूजी वेटनरी कॉलेज पटना में क्लर्क हुआ करते थे। उसी कॉलेज में उनके बड़े भाई ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में सेवाएं दी हैं। 



1996 में उजागर हुए इस घोटाले ने लालूजी से बहुत कुछ छीना। करीब 900 करोड़ के चारा घोटाले में लालूजी पर 5 वर्ष का सश्रम कारावास और 25 लाख रुपए का जुर्माना पहले ही हो चुका है। इसके पहले 1997 में उन्हें जनता दल छोडऩा पड़ा। इसी बरस मुख्यमंत्री की कुर्सी गई। हालांकि ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उन्होंने भारी विरोध के बावजूद पत्नी राबड़ी देवी को ही सिंहासन सौंप दिया था। इसके बाद सांसदी से भी हाथ धोना पड़ा और छह बरस के लिए चुनाव लडऩे का प्रतिबंध भी झेल रहे हैं। फिलहाल वे सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत पर ही खुली हवा में सांस ले पा रहे थे। अब फिर जेल पहुंच गए हैं। 

हालांकि बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी है। दोषी ठहराए जाने के बाद एक के बाद एक किए ट्वीट में उन्होंने अपना खूंटा ठोंक अंदाज बरकरार रखा। उन्होंने लिखा...''साथ हर बिहारी है, अकेला सब पर भारी है, सच की रक्षा करने को लालू का संघर्ष जारी है।'' फिर लिखा...''देश के न्यायप्रिय और शांतिप्रिय साथियों हर षड्यंत्र से बचना होगा, हर हाल में लडऩा होगा, विजय पथ पर चलना होगा।'' आखिर में मोदी और भाजपा को भी नहीं बख्शा और लिखा ''झूठे जुमले बुनने वालों, सच अपनी जिद पर खड़ा है, धर्मयुद्ध में लालू अकेला नहीं पूरा बिहार साथ खड़ा है।'' हालांकि एक सज्जन ने उन्हें उन्हीं के अंदाज में बखूबी जवाब भी दिया कि ''कौन कर्म कइले लालूजी कि सब परिवार के हो गइल जेल।'' 

वैसे इस बार भी लालूजी पर राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा असर होने की संभावना नहीं है। पिछली बार उन्होंने राबड़ी देवी को आगे किया था। इस बार भी संभवत: उन्हें कोर्ट के नतीजों का अंदाजा था, इसलिए बेटे तेजस्वी को पहले ही पार्टी की कमान सौंप चुके हैं। एक राजनीतिक शख्सियत के रूप में लालूजी ने अपना किरदार कुछ इस तरह से ढाल रखा है कि उनके लिए सारी नकारात्मकता भी सकारात्मक हो जाती है। ठेठ देशी अंदाज है, जो शहरियों को ठहाके लगाने पर विवश करता है और गांव के लोग उनके साथ अपनापन महसूस करते हैं। 

उन्हें राजनीति में नौटंकी को प्रवेश दिलाने का श्रेय भी दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने इस कला का पूरा इस्तेमाल किया है। बोलने, चलने-फिरने, उठने-बैठने, कपड़े-लत्ते से लेकर होली और छठ पूजा के उत्सव तक हर अंदाज में खुद को इस तरह पेश किया कि दुश्मन भी उन्हें देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। हर साल होली पर फटी बंडी में रंग से सराबोर लालूजी का ढोल बजाते हुए फोटो कितने लोग भूल पाते हैं। सभाओं और टीवी चैनल्स पर अगड़म-बगड़म बोलते मुंहफट लालूजी को देखकर किसने ठहाके नहीं लगाए होंगे। जहां खड़े हो जाएं, वहां भीड़ जुटा लें। जो बोलना शुरू करें तो अखबारों की हेडलाइंस बना दें। माहौल को अपने हिसाब से ढालने की जो कला उनमें है, वैसी किसी और में ढूंढने से नहीं मिलेगी।



आप कह सकते हैं कि वे घाघ राजनीतिज्ञ हैं और काले-सफेद चौखानों वाले इस खेल के माहिर उस्ताद। इसकी बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि गरीब किसान के बेटे लालूजी ने एमए में राजनीति का पाठ पढ़ा और कॉलेज से ही उसके सिद्धांतों को अमल में लाने की शुरुआत भी की। पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव लड़े और उसी आधार पर 1977 में उन्हें छपरा से जनता दल से टिकट मिला। वे 29 बरस की उम्र में ही संसद पहुंच गए थे।  

अपनी दीर्घ राजनीतिक यात्रा में उन्होंने विशुद्ध राजनीतिक हथकंडे अपनाने से कभी परहेज नहीं किया। अवसरवादिता के अनुयायी होकर वे कभी कांग्रेस के करीब हो जाते हैं तो कभी जनता दल के गले लग जाते हैं। जातीय राजनीति की आग को कभी बुझने नहीं देते, क्योंकि जानते हैं कि यही राजनीति उनका अस्तित्व बनाए रखेगी। यही वजह है कि आज सजा होने के बाद ये जुमले भी उड़ाए गए कि उन्हें सजा इसलिए हुई क्योंकि वे यादव हैं, अगर उनके नाम के पीछे मिश्रा लिखा होता तो वे भी बरी कर दिए गए होते।





By - अमित मंडलोई

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