सिजदानसीं से बागी होने तक का स्त्री गान।




भरा दरबार और मसनद पर बादशाह अकबर सवार ; इतने में पर्दा खुलता है। दोनों करों को उर से चिपकाये नायिका बाहर आती है। बादशाह अकबर को सिजदा करती है। बादशाह का अहंकार चरम पर है। महारानी भी पति छांव में अहंकार का लबादा ओढ़े अभिजात्य हंसी हंस रही है। शहजादा हमेशा की तरह कायराना अंदाज अख्तियार किये है। अन्य दरबारी भी कला अभ्यास (दरबार और दरबारियों के लिए प्रदर्शन ) को अपनी - अपनी समझ के अनुरूप देख रहे है। चंद लम्हों में ही उसके पाँव की थिरकन और घुंघरू की खनक पूरे दरबार को अपने आगोश में समेट लेती है।

"इंसान किसी से दुनिया में इक बार मुहब्बत करता है ; इस दर्द को लेकर जीता है , इस दर्द को लेकर मरता है। " मुखड़े के साथ नृत्य को संगीत का साहचर्य मिलता है। नायिका ने अपने तेवर दिखा दिए है लेकिन बादशाह अभी अनजान है। "जब प्यार किया तो डरना क्या " सुनते ही बादशाह की चमक फीकी पड़ने लगती है ; अहंकार की जमीं दरकने लगती है। "आज कहेंगे दिल का फ़साना , जान भी ले चाहे जमाना। " से नायिका अपने स्वभाव में आ गयी है।



"उनकी तमन्ना दिल में रहेगी , शम्मा इसी महफ़िल में रहेगी।" मुखड़े में नायिका अवल्ल दर्जे का प्रेम उन्मुक्त होकर लुटाती है , किन्तु नायक का पैंपर्स ब्वाय की तरह अपने बाप को प्रेमजवाब देने के लिए देखना पुरुष समाज को गाली प्रतीत होता है। बादशाह के गुस्से में उनकी पालतू महारानी भी बाई डिफाल्ट शरीक हो जाती है जो पितृसत्तातमक समाज की बानगी भर है।

"छुप न सकेगा इश्क़ हमारा , चारो तरफ है उनका नजारा।" की चकाचौंध से बादशाह की आँखों का कुम्हलाना प्रेमी समाज को दूजे किस्म का संतोष देता है। "पर्दा नहीं जब कोई खुदा से , बन्दों से पर्दा करना क्या।" के अंतरे के साथ नायिका पर्दानफीसियत को भी चुनौती देती है। आज शायद शकील बदायुनी साहब ये कहते तो कठमुल्ले उन्हें बुरका विरोध के लिए फांसी पर लटका देते। अंत में खीझा हुआ बादशाह हाथो को झटके से झुकाकर नृत्य को समाप्त करने की बात कहकर अपनी हार की तस्दीक खुद ही कर देता है।



६ मिनट ५ सेकण्ड का यह चलचित्र एक कालखंड समेटे है। जिसमे स्त्री सिजदा के साथ शुरुआत तो करती है। मगर कुछ ही देर में उसका पाँव एक्सेलेरेटर पर आता है और वो बागी हो जाती है जो महिला सशक्तिकरण का उद्घोष है।

धन्यवाद नौशाद साहब इतना कर्णप्रिय संगीत निवेशित करने के लिए । साथ ही साधुवाद मधुबाला जी को ; जिन्होंने नृत्य को जीवंत कर दिया।

By - संकर्षण शुक्ला



Comments