क्लासिक सिनेमा : फिल्म 'गाइड' : दो


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इस फिल्म की कहानी के एक दृश्य में नायिका को अपना गुस्सा, दुःख और आज़ादी की चाहत व्यक्त करनी थी. इसे दिखाने के लिए कुछ नया करने का विचार विजय आनंद के दिमाग में आया. तय यह हुआ कि एक सर्पिणी-नृत्य के माध्यम से नायिका के मनोभावों को अंकित किया जाए. सपेरों की बस्ती का सेट लगाया गया जहाँ वहीदा रहमान को नृत्य करके नायिका के भावों को व्यक्त करना था. केवल नृत्य, नृत्य के साथ संगीत लेकिन कोई शब्द नहीं. बेक-ग्राउंड संगीत रचने की ज़िम्मेदारी बर्मन दादा पर थी. 

संगीत में 'इफेक्ट' पैदा करने के लिए सामान्य साजों के अतिरिक्त बहुत कुछ जोड़ा गया, जैसे, ताल में प्रभाव के लिए तबला, ढोलक, ढोल, चेंदा और ढपली का अलग-अलग मूड के अनुसार उपयोग किया गया. अतिरिक्त प्रभाव उत्पन्न करने के लिए घुँघरू, झांझरी, कब्बस और रेजो-रेजो की मदद ली. सितार, बेन्जो, मेंडोलिन और क्ले-वायलिन आदि वाद्य-यन्त्रों का सहारा लेकर सर्पिणी नृत्य का पार्श्व संगीत तैयार किया गया. सचिन दा ने वहीदा से कहा, 'देखो, इस कम्पोजीशन में शब्द नहीं हैं, केवल म्यूजिक है. अब मौक़ा है तुम्हें अपना हुनर दिखाने का.'

सचिनदेव बर्मन खुश थे लेकिन सोच रहे थे कि क्या यह दर्शकों को पसंद आएगा? 

शूटिंग चालू हुई तब वे भी वहां वहीदा की प्रस्तुति देखने के लिए खुद मौजूद थे. वहीदा रहमान काली और लाल रंग की साड़ी पहनकर आई, साथ में सह-नर्तकियां भी ग्रामीण वेशभूषा में आकर खड़ी हो गयी. वहीदा विश्वास भरी मुस्कुराहट के साथ सेट पर खड़ी होकर बेक-ग्राउंड-म्यूजिक को ध्यान से सुनने लगी. अचानक उसके चेहरे की रंगत और शरीर की भाषा बदलने लगी. क्रोध, मायूसी और निर्भीकता का भाव उभरने लगे. कई शाट्स के बाद नृत्य निर्देशक हीरालाल और सोहनलाल के मार्गदर्शन में नृत्य का फिल्मांकन पूरा हुआ. 

उस प्रस्तुति में वह वहीदा 'रोजी' बन गयी थी. सचिन दा ने खुश होकर कहा, 'वहीदा, मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा होगा. मुझे तो बहुत डर लग रहा था मगर लगता है तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारा दुःख, सब कुछ उसमें निकल आया.'  

उस वर्ष के 'फिल्म फेयर अवार्ड्स' में फिल्म गाइड को सात श्रेणियों में पुरस्कार मिले जिनमें से एक था, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, वहीदा रहमान. (क्रमशः)




लेखक - द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
(साधारण सोच वालासामान्य मनुष्य)

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