सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज़ “ जूठन ”।




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हम भारतीय कहकर स्वयं में गर्व का अनुभव करते है, आखिर ऐसा क्या है ? क्या हमारी सांस्कृतिक धरोहर विश्व के अन्य देशों की तुलना में श्रेष्ठ है या हमारी सामाजिक व्यवस्था जो मनुष्य को मानव निर्मित करने में अपनी श्रेष्ठ भूमिका निभाती है, उस पर गर्व है। हालाकि गर्व करने की ऐसी कोई बात ही नहीं है, ये आत्म प्रवंचना है। प्राचीन आर्य व्यवस्था ने जिस समाज व्यवस्था की नींव हमारे देश में रखी थी वह आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। वेदों में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म है। कर्मों के आधार पर जाति व्यवस्था की नींव रखी गई है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों का परिचय है। इन सभी वर्णों का कार्य निश्चित था- ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ जाति थी, जिनका मूल कार्य पठन–पाठन  के द्वारा ज्ञान अर्जित कर समाज को न्याय की पाठ पढ़ाना, पूजा–पाठ ,यज्ञ, धर्म की शिक्षा आदि के साथ-साथ राजाओं को उचित परामर्श देना था। क्षत्रिय का कार्य देश में नियम-कानून लागू कर प्रशासन-व्यवस्था को कायम रखना, देश की रक्षा करना। वैश्य का काम व्यवसाय कर देश को आर्थिक रूप से सम्पन्न करना और शूद्र का कार्य इन सभी जाति के लोगों के लिए काम करना, उनकी सेवा करना आदि था। 

1“चातुर्वणर्य  व्यवस्था की वर्जनाओं के बरक्स शूद्रों का सामाजिक स्तर और शैक्षणिक उन्नयन अवरुध्द रहा, आर्थिक विकास चौपट रहा,सामाजिक स्तर घृणा और फाका का पर्याय रहा। शिक्षा का एक एक शब्द सुन ले तो उसके कण में पिघला हुआ सीसा डाल देने की सुदीर्घ परंपरा रही। एव सभी पेशे-धंधे जो अर्थमूलक और मन-सम्मान के थे, शूद्रों के हाथों से छिन लिए और सेवा-कार्य से जुड़े सफाई और चर्म जैसे घृणापद पेशे दे दिए गए।”  लेकिन आज भी हम शूद्र को हम उसी रूप में देखते है जिस रूप में हमारे मनीषियों ने देखने की दृष्टि दी है। विश्व का विकास हो रहा है, हम आधुनिक हो रहे है दुनिया का भूमंडलीकरण हो गया है देश गाँव हो गया है, लेकिन अभी भी हम विचारों से आधुनिक नहीं हुए है अभी भी हम परंपरावादी  विचारों से लैस है। 

सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ है, हम विज्ञान के युग में जी रहे है जहाँ नित्य नए साधनों का प्रयोग कर  जीवन को खुशहाल बना रहे  है। आधुनिकता के इस दौर में तो हम बाहरी रूप से आधुनिक हो गए हैं, किन्तु आंतरिक रूप से आज हम वहीं है जहाँ प्राचीन सामाजिक वर्ण-व्यवस्था थी। आज भी हम मानसिक रूप से उन्नत नहीं हो पाए हैं। हमारी विचारधारा स्वतंत्र नहीं हो पाई है। साहित्य में लगातार ऐसी विषयों पर चर्चा होती रही है। 

2“प्राचीन काल में गौतमबुध्द  ने सर्वप्रथम इस व्यवस्था की नींव हिला दी थी, मध्यकाल में कबीर ,रैदास ,गुरुनानक आदि संतों ने वर्ण व्यवस्था के प्राचीन रूढ़ियों को तोड़कर नई सामाजिक व्यवस्था कायम करने का प्रायस किए। आधुनिक काल के साहित्यकारों ने भी सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका केवल लेखनी के माध्यम से चलाया किन्तु वास्तविक रूप में परिवर्तन का प्रभाव नगण्य रहा।” स्वतन्त्रता प्राप्ति के दलितों के विकास के लिए नए कानून बनाएं गए। डॉ0 अंबेडकर ने दलितों के अधिकार के लिए आमरण संघर्ष किया, बाबा आमटे जैसे लोग आज भी सक्रिय है।

ओम प्रकाश वाल्मीकि (यूट्यूब फ़ोटो)


 3 “दलितों के अधिकारों के लिए इतना होने के बावजूद भी आज भी स्वर्णों की मानसिकता में बदलाव नहीं आया  है। कुछ स्वर्णों की मानसिकता में बदलाव आया है किन्तु मैं इसे अपवाद ही मानेंगे।” दलितों का उद्दार तभी संभव है जब सम्पूर्ण स्वर्णों के मानसिकता में बदलाव आए , दलितों को समान रूप से सामाजिक अधिकार मिलें और ये देश के विकास की मुख्यधारा के साथ जुड़ सके।

          “जूठन” ओमप्रकाश बाल्मीकि द्वारा लिखित आत्माकथा है। बाल्मीकि जी ने अपने आत्मकथा के माध्यम से दलित समाज की यथार्थ व्यथा-कथा को मार्मिक ढंगा  से व्यक्त किया गया है। बाल्मीकि जी ने अपने जीवन के भोगे हुए यथार्थ को चित्रित करते हुए स्वर्ण समाज की व्यवस्था का पोल खोल दिए है। 

जन्म से लेकर मृत्यु तक  स्वर्ण  के अमानवीय व्यवहार को चित्रित करते हुए कहते है कि 

4 “स्कूल में दूसरों से दूर बैठना पड़ता था, वह भी जमीन पर। अपने बैठने की जगह आते आते चटाई छोटी पड़ जाती थी। कभी- कभी तो एकदम पीछे दरवाजे के पास बैठना पड़ता था, जहाँ से बोर्ड पर लिखे अक्षर धुंधले दिखते थे। स्कूल के अध्यापक उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे, पानी पीने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था, कक्षा में  सभी लड़कों के साथ न बैठकर सबसे पीछे खाली जमीन पर बैठना पड़ता था।”

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          देश को आजादी मिले आठ साल हो गए थे। महात्मा गाँधी की अछूतोध्दार की प्रतिध्वनियाँ पूरे देश में गूँज रही थी, दलितों का स्कूल में प्रवेश मिल गया था किन्तु जनसामान्य के मानसिकता में बदलाव नहीं आया था। दलित विद्यार्थियों को वेवजह पिटाई और तरह–तरह की यातनाएँ दी जाती थी। सवर्ण मानसिक रूप से दलितों को प्रताड़ित कर सामाजिक अधिकार नहीं देना चाहते थे। यहाँ तक स्कूल के शिक्षक का व्यवहार तक अमानवीय हुआ करता था। दलितों का सम्बोधन भी अमानवीय हुआ कराते थे। 

वाल्मीकि जी के द्वारा  कहे गए शब्दों में  5 “अबे! वो चूहड़े ,मादरचोद कहाँ घुस गया है ..........अपनी माँ।”  इस तरह के तिलमिला देने वाले सम्बोधन मानवता तक को झकझोर देता है। क्या किसी शिक्षक का अपने छात्र के प्रति ऐसा व्यवहार मानवीय है ? 

दलितों के खान-पान ,रहन-सहन, कपड़े–लत्ते सब पर फब्तियाँ कसी जाती थी 6“अबे ! चूहड़े का नए कपड़े पहनकर आया है। मैले पुराने कपड़े पहन कर जाओ, तो कहते है अबे चूहड़े के दूर हट बदबू आ रही है।” कभी- कभी तो दलित छात्रों को ऐसी सजा दे दी जाती थी कि ज़ो पूर्णत: अमानवीय थी  6“जा लगा पूरे मैदान में झाड़ू .........नहीं तो गांड में मिर्ची डालकर स्कूल के बाहर काढ़ (निकाल ) देंगे।” बाल्मीकि जी ऐसे कई कटु अनुभवों को झेलते हुए जीवन संग्राम में आगे बढ़ते  जा रहे थे।

              सामाजिक व्यवस्था के अंतगर्त सवर्ण दलित को बेगार करनेवाली मशीन समझते थे। उससे जितना चाहो काम लो और देने के नाम पर भूसी भरी एक–आध रोटी, ज्यादा विरोध करने पर ऊपर से दो-चार लात- मूका। सवर्णों के नजर में दलित को ना अच्छा खाने का आधिकार है और ना ही साफ–सुथरे कपड़े पहनने का, जूठन पर पलने का अधिकार दिया था। 

7“ शादी –व्याह के मौके पर जब मेहमान या बाराती खाना खा रहे होते थे तो चूहड़े दरवाजे के बाहर बड़े-बड़े टोकरे लेकर बैठे रहते थे। बारात के खाना खा चुकने पर जूठी पत्तलें  उन टोकरों में डाल दी जाती थी, जिन्हें घर जाकर वे जूठन इकट्ठी कर लेते थे। पूड़ी के बचे खुचे टुकड़े, एक आध मिठाई का टुकड़ा या थोड़ी बहुत सब्जी पत्तल पर पाकर बाछे खिल जाती थीं। जूठन चटखारे लेकर खाई जाती थी।”

             प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत दलितों को सवर्ण समाज से अलग बिलकुल अलग किसी नाले या जहाँ कूदे-करकट को फेका जाता है वहीं रहने का स्थान होता था, जो नरक से कम नहीं हो होता था। बरसात के दिनों में तो नारकीय उदण्डता और भी बढ़ जाती है। चारों तरफ नहर–नाले, गंदगी, बरसात आते ही घरों  में गंदगी का प्रकोप बाद जाता है। चारों तरफ गंदा पानी के साथ नाक की नसों को फटा देने वाली बदबू फैल जाती है। 

ओमप्रकाश जी इन्हीं बरसात के दिनों की घटनाओं को याद करते हुए लिखते हैं 

8 “बरसात के दिन नरक से कम नहीं थे, गलियों में कीचड़ भर जाता था, जिससे आना-जाना काफी मुश्किल  हो जाता था , किचड़ों में सूअरों की गंदगी भरी रहती थी जो बारिश रुकने के बाद गंधियाने लगती थी। मक्खी –मच्छर ऐसे पनपते थे जैसे टिड्डी के दल।” बरसात के दिनों में दलितों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ता था। खाने-खाने को मोहताज हो जाते थे। भूख की पीड़ा को शांत करने के लिए चावल के पानी को अमृत समझा के पी लेते थे। दलितों में अशिक्षा के अभाव में भूत –प्रेत, झाड–फूँक के चक्कर में फंस कर अपनी जान तक गंवा देते थे।

          जीवन संघर्ष की पगडंडियों पर आगे बदते हुए जब उन्होंने कॉलेज में प्रवेश किया। वहाँ का परिवेश भी कुछ हद तक अनुकूल होने बावजूद भी जातिगत विसंगतियों का सामना करना पड़ता। पढ़ाई में अव्वल होने के कारण सवर्ण शिक्षकों के कोप का भी शिकार होना पड़ा। अंतत: उस कॉलेज को भी छोड़ना पड़ा। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए देहरादून जाना पड़ा। जहाँ का परिवेश पूर्ण रूप से ना सही, पर आंशिक रूप से उनके अनुकूल होने से आगे की पढ़ाई शुरू की लेकिन आर्थिकाभाव के कारण जीविका के तलाश में उन्हें पढ़ाई छोड़कर मुंबई अंबरनाथ ऑर्डिनेन्स फ़ैक्टरी में नौकरी मिल गई, और यही से वह दलित साहित्य  के संपर्क में आया। मुंबई आने के पश्चात ही उन्होंने डॉ0 अंबेडकर के विषय में जान पाए। तत्कालीन समय  में जहाँ पुस्तकालयों का संरक्षण सवर्णों  के हाथों में था, वहाँ अंबेडकर के पुस्तकों को नहीं रखा जाता था। अंबरनाथ फ़ैक्टरी के कुछ लोग ऐसे थे की वाल्मीकि का अर्थ पंडित समझते थे, जिससे उन लोगों का व्यवहार उनके प्रति शालिन था पर ज्यों ही वास्तविकता से परिचय हुआ, व्यवहार में कटुता आ जाती है। सवर्ण अभिमान उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते। बाल्मीकि जी को ऐसे कई ऐसे कटु अनभवों से गुजरना पड़ा। अंबरनाथ से चंद्रपूर तक सभी जगह उन्हें ऐसी परिस्थियों से सामना करना पड़ा। चंद्रपुर में एक स्कूल की घटना जो दलित समाज को झकझोर  कर रखा दिया, एक सवर्ण शिक्षक ने पाठ्य–पुस्तक से डॉ0 अंबेडकर को फाड़ कर निकलवा देना और शिक्षा-प्रशासन की ओर से कोई ठोस निर्णय ना लेना ,सवर्ण जाति की मानसिकता का परिचय है।

      दलित समस्या ऐसी  समस्या है, जिन्हें  सवर्ण कभी नहीं चाहते की खत्म हो क्योकिं वर्णाश्रम व्यवस्था के अंतर्गत दलित, शूद्र सम्मान के पात्र नहीं बल्कि अपमान और लांछन के पात्र  है। तुलसीदास ने बड़ी सहजता से कहा था- शूद्र, ढ़ोल, गंवार और नारी, तीनों तारण के अधिकारी। इस उक्ति से स्पष्ट समझा जा सकता है कि सवर्ण साहित्यकार जहाँ एक ओर मानवता के विकास में समन्वय वादी नीति का प्रचार कर रहे हैं, वहीं दलित, नारी, अशिक्षित, गँवार लोगों के प्रति ऐसा रवैया रखते हैं। क्या दलित सभ्यता का अंश नहीं ? क्या वह एक पशु है ? जिनका स्वयं पर अधिकार नहीं ? “जूठन” के नायक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने जीवन के उन कटु सत्यों को उभारा है जिसको सवर्ण स्वीकार करने को तैयार नहीं। यहाँ वाल्मीकि का स्वयं भोगा हुआ यथार्थ नहीं बल्कि समस्त दलित जाति का भोगा हुआ यथार्थ है। 

ना जाने ऐसे कई दलित है, जो अपने अनुभवों को स्वयं भोग कर जिए चले जा रहे हैं। जिनका उध्दार ना राष्ट्र, ना समाज करने इच्छुक है। संवैधानिक तौर पर तो उन्हें समानता का अधिकार दिया गया है, किन्तु व्यावहारिक स्तर पर अब भी वे असमानताएँ बनी हुई है। स्वतन्त्रता के छः दशक पूरे होने और आधुनिकता के तमाम आयातित अथवा मौलिक रूपों को भीतर तक आत्मसात कर चुकाने के बावजूद आज भी हम कहीं ना कहीं सवर्ण और अवर्ण के दायरे में बंटे हुए हैं। सिध्दांतों और किताबी बहसों से बाहर जीवन में हमें आज अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जिनसे हमारी जाति और वर्णगत असहिष्णुता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। 

9 “ऐसे उदाहरणों कि शृंखला है जिन्हें एक दलित व्यक्ति ने अपनी पूरी संवेदना के साथ खुद भोगा है।” इस आत्मकथा में लेखक ने स्वाभाविक ही अपने  उस आत्म कि तलाश करने कि कोशिश कि है, जिसे भारत का सवर्ण तंत्र सदियों से कुचने का प्रयास करता रहा  है, कभी परोक्ष रूप में तो कभी अप्रत्यक्षत:। इसलिए इस पुस्तक की पंक्तियों में पीड़ा भी है, असहायता भी है, आक्रोश और क्रोध भी और अपने आप को आदमी का दर्जा दिए जाने की तीव्र मानवीय इच्छा भी है।


By - अजय चौधरी 






संदर्भ-सूची 

1. सांभरिया ,रत्नकुमार – दलित सजाज की कहानियाँ – भूमिका-पृष्ठ सं0-10

2. मुद्रराक्षस –सं0-नयी सदी की पहचान श्रेष्ठ दलित कहानियाँ –भूमिका-पृ0-5

3. मुद्रराक्षस –सं0- नयी सदी की पहचान श्रेष्ठ दलित कहानियाँ –भूमिका-पृ0-6

4. वाल्मीकी, ओमप्रकाश – जूठन –संस्करण -2013 -पृ0 सं0 -13

5. वाल्मीकी, ओमप्रकाश – जूठन –संस्करण -2013 -पृ0 सं0-13

6. वाल्मीकी, ओमप्रकाश – जूठन –संस्करण -2013 -पृ0 सं0-13

7. वाल्मीकी, ओमप्रकाश – जूठन –संस्करण -2013 -पृ0 सं0-19

8. वाल्मीकी, ओमप्रकाश – जूठन –संस्करण -2013 -पृ0 सं0 -13

9. सांभरिया ,रत्नकुमार – दलित सजाज की कहानियाँ – भूमिका-पृष्ठ सं0-15

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